Friday, July 17, 2026
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नेगड़िया हाई लेवल ब्रिज : विकास की पहचान या बन गया सुसाइड पॉइंट?

हर कुछ महीनों में एक हादसा, अब उठने लगे हैं कई गंभीर सवाल

@आशीष बागड़ी


Deoli News 17 जुलाई (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) शहर के पुराने अजमेर-कोटा मार्ग पर स्थित नेगड़िया हाई लेवल ब्रिज कभी डूब क्षेत्र के हजारों लोगों के लिए राहत और विकास का प्रतीक बनकर सामने आया था। वर्षों की मांग और लंबी प्रतीक्षा के बाद बने इस पुल ने देवली और आसपास के गांवों की दूरी कम कर दी।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यही पुल अब एक बेहद चिंताजनक पहचान की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। लगातार सामने आ रही आत्महत्या और संदिग्ध डूबने की घटनाओं ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या नेगड़िया हाई लेवल ब्रिज अब धीरे-धीरे “सुसाइड पॉइंट” बनता जा रहा है? दरअसल बदलती जीवनशैली, मानसिक तनाव, अवसाद, पारिवारिक विवाद, आर्थिक तंगी, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, हाल के वर्षों में युवाओं में प्रेम संबंधों में विवाद, ब्रेकअप, भावनात्मक तनाव और सामाजिक दबाव जैसी परिस्थितियां भी मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रही हैं।

वहीं सहनशीलता में कमी जैसे कारण आज समाज में मानसिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती बन चुके हैं। मनोरोग विशेषज्ञ भी मानते हैं कि गंभीर अवसाद से जूझ रहे व्यक्ति को कई बार जीवन समाप्त करना ही एकमात्र रास्ता दिखाई देता है। यही कारण है कि आत्महत्या की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। नेगड़िया हाई लेवल ब्रिज पर भी पिछले कुछ वर्षों में कई युवक, युवतियां, महिलाएं और बुजुर्ग बनास नदी में छलांग लगा चुके हैं। अधिकांश मामलों में परिजनों द्वारा पुलिस को पैर फिसलने या दुर्घटना की रिपोर्ट दी जाती है, लेकिन स्थानीय लोगों के बीच इन घटनाओं को लेकर अलग ही चर्चा रहती है। हाल ही में निवाई निवासी तथा राजकीय अस्पताल देवली में संविदा पर कार्यरत रेडियोग्राफर इशू शर्मा का शव भी एसडीआरएफ की टीम ने तीसरे दिन बनास नदी से बरामद किया।

इस घटना के बाद एक बार फिर यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि लगभग हर एक-दो महीने में इस पुल से डूबने या कूदने की घटना सामने आ जाती है। अधिकांश मामलों में शव दो से तीन दिन बाद ही बरामद हो पाता है। पुल के नीचे बनास नदी में लगभग 40 से 50 फीट गहरा पानी होने के कारण एक बार छलांग लगाने के बाद बचने की संभावना बेहद कम रह जाती है। यही वजह है कि यह स्थान आत्महत्या की कोशिश करने वालों के लिए आसान लक्ष्य बनता जा रहा है। अब सवाल केवल एक पुल का नहीं, बल्कि समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी का है। क्या इन घटनाओं को केवल व्यक्तिगत निर्णय मानकर छोड़ दिया जाए, या फिर इन्हें रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं?

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पुल पर ग्रिल फेंसिंग लगाने से समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं होगी, लेकिन इससे कई घटनाओं को टाला जा सकता है और व्यक्ति को दोबारा सोचने का अवसर मिल सकता है। लेकिन बनास का विस्तार काफी है। लिहाजा आत्महत्या करने वाले व्यक्ति को नहीं रोका जा सकता। लोगों का कहना है कि कोटा के हैंगिंग ब्रिज सहित कई स्थानों पर सुरक्षा फेंसिंग और निगरानी व्यवस्था के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। इसी प्रकार नेगड़िया हाई लेवल ब्रिज पर भी ऊंची सुरक्षा ग्रिल, सीसीटीवी कैमरे, नियमित पुलिस गश्त, चेतावनी बोर्ड, हेल्पलाइन नंबर और आपातकालीन सहायता व्यवस्था विकसित की जा सकती है। साथ ही समाज की भी बड़ी जिम्मेदारी है। परिवारों को मानसिक तनाव से जूझ रहे लोगों की समय रहते पहचान करनी होगी। अवसाद, चिंता और अकेलेपन को कमजोरी नहीं, बल्कि इलाज योग्य स्थिति मानते हुए ऐसे लोगों को परामर्श और सहयोग उपलब्ध कराना होगा। स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता अभियान भी चलाए जाने चाहिए।

नेगड़िया हाई लेवल ब्रिज विकास की पहचान बना रहे, मौत का पर्याय नहीं। यह केवल प्रशासन ही नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह पुल अपनी उपयोगिता से अधिक दर्दनाक घटनाओं के लिए याद किया जाने लगेगा। अब समय आ गया है कि प्रशासन, जनप्रतिनिधि और समाज मिलकर इस दिशा में ठोस पहल करें, ताकि एक भी अनमोल जीवन यूं असमय समाप्त न हो। इसमें मीडिया का भी अहम योगदान रहे।

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