Deoli News 19 अक्टूबर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) महावीर दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में मुनि सुप्रभ सागर महाराज ने कहा कि जो व्यक्ति धर्म के बंधन में रहता है, वह महान पद को प्राप्त कर लेता है। धर्म और अनुशासन व्यक्ति के जीवन को श्रेष्ठ बनाने के साथ आत्मा को सुख-शांति की ओर ले जाते हैं।
मुनि ने कहा कि भगवान जन्म, जरा और मृत्यु से स्वतंत्र होने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। आत्मा की यह स्वतंत्रता सदा सुख और शांति प्रदान करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता नहीं है। वर्तमान समय में व्यक्ति का जीवन अनुशासन से रहित होने के कारण कष्टप्रद बनता जा रहा है। वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए अनुशासन में रहना आवश्यक है। अनुशासन में बहने वाली नदी अंततः महासागर तक पहुंच जाती है, जबकि अनुशासनहीन नदी स्वयं भी बर्बाद होती है और दूसरों के जीवन में भी संकट उत्पन्न करती है। इसी प्रकार अनुशासन में रहने वाला व्यक्ति महापुरुष बन जाता है, जबकि अनुशासनहीन व्यक्ति अपने साथ दूसरों के जीवन को भी संकट में डाल देता है। भगवान के चरणों में आने वाला पतित व्यक्ति भी पावन बन जाता है।
धर्मसभा में मुनि वैराग्य सागर महाराज ने पर्व के दिनों को आत्मसाधना के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इन दिनों में त्याग, तपस्या और धर्म आराधना का विशेष महत्व है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति रात्रि में चारों प्रकार के आहार का त्याग करता है, उसे एक माह में 15 दिन के उपवास के बराबर फल की प्राप्ति होती है। मुनि ने शरीर की तुलना काणे गन्ने से करते हुए कहा कि काणे गन्ने को खाने से रस नहीं मिलता, लेकिन उसे उपजाऊ भूमि में बोने पर वह रसदार गन्ना बन सकता है।
इसी प्रकार शरीर को इंद्रिय विषयों के भोग में लगाने से वास्तविक सुख की प्राप्ति नहीं होती, जबकि इसी शरीर को धर्म, ध्यान और आत्मसाधना में लगाने से शाश्वत सुख का मार्ग प्रशस्त होता है।


