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खराब लाइफस्टाइल और शारीरिक श्रम की कमी से बढ़ रहे कब्ज के रोगी

50 की उम्र के बाद अचानक बदलाव हो सकता है जानलेवा

@आशीष बागड़ी


Deoli News 28 मार्च (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) बॉम्बे हॉस्पिटल जयपुर के गैस्ट्रोलॉजिस्ट डॉ. सेबेस्टियन मारकर के अनुसार आधुनिक दौर की बिगड़ती जीवनशैली और शारीरिक व्यायाम से दूरी कई गंभीर बीमारियों की जड़ बन रही है, जिनमें कब्ज सबसे प्रमुख है। आज के समय में अनुचित खान-पान और दिनचर्या में अनुशासन का अभाव इस समस्या को बढ़ा रहा है। यह बात डॉ. मारकर ने दैनिक ब्यूरो से विशेष बातचीत में कहीं। दरअसल डॉ. मारकर हर महीने के दूसरे और चौथे शनिवार को शहर के महेश नर्सिंग होम में रोगियों को परामर्श देते हैं।

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कब्ज का स्वरूप हर रोगी में भिन्न होता है

जहाँ कुछ रोगियों को मल की कम मात्रा की शिकायत होती है, वहीं कुछ को अत्यधिक कठोर मल आने की समस्या होती है। सामान्य कब्ज को केवल लाइफस्टाइल में सुधार, भोजन में फाइबर युक्त पदार्थों की वृद्धि, भरपूर पानी के सेवन, नियमित व्यायाम और पर्याप्त नींद के जरिए ठीक किया जा सकता है। यदि इन सुधारों के बाद भी राहत न मिले, तो यह किसी अंतर्निहित बीमारी का संकेत हो सकता है, जिसके लिए थायराइड और शुगर जैसे मेडिकल टेस्ट कराना आवश्यक है।

गंभीर लक्षणों की अनदेखी पड़ सकती है भारी

डॉ. सेबेस्टियन मारकर ने ‘अचानक होने वाली कब्ज’ को लेकर विशेष चेतावनी दी है। यदि किसी व्यक्ति का पेट वर्षों से ठीक साफ हो रहा हो और अचानक कुछ ही दिनों में कब्ज की समस्या शुरू हो जाए, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। विशेषकर 50 से 60 वर्ष की आयु के बाद अचानक कब्ज होना, बिना कारण वजन कम होना, मल त्याग के दौरान खून आना या लगातार उल्टी होना जैसे लक्षण जानलेवा बीमारी ‘कैंसर’ के संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में तत्काल डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए और एंडोस्कोपी करानी चाहिए, ताकि बीमारी का शुरुआती स्तर पर पता चल सके। फंक्शनल कांसेपशियन के रोगियों को भी विशेष चिकित्सकीय परामर्श की आवश्यकता होती है, ताकि सही उपचार पद्धति अपनाई जा सके और समय रहते बचाव हो सके।

कब्ज निवारण में योग, प्राणायाम और शंख प्रक्षालन का विशेष महत्व

प्राकृतिक उपचार और बचाव की चर्चा करते हुए डॉ. मारकर ने बताया कि योग और प्राणायाम कब्ज के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार हैं। नियमित योगाभ्यास से पेट की आंतों में ‘मूवमेंट’ बढ़ता है, जिससे पाचन प्रक्रिया सुचारू होती है। प्रतिदिन कम से कम आधे घंटे की सैर आंतों की सक्रियता के लिए बेहद जरूरी है। इसके साथ ही आयुर्वेद की ‘शंख प्रक्षालन’ विधि भी पेट की पूर्ण सफाई के लिए काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। योग न केवल कब्ज में राहत देता है बल्कि पूरे पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है। आमजन को दवाइयों पर अत्यधिक निर्भर रहने के बजाय अपनी दिनचर्या में शारीरिक श्रम और योग को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि वे इस लाइफस्टाइल जनित बीमारी से सुरक्षित रह सकें।

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