अनटोल्ड स्टोरी- कारसेवा 1990 (2)
राजेन्द्र बागड़ी, स्वतंत्र पत्रकार
Special Story 16 जनवरी (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) कार सेवा के पहले चरण में देवली तहसील से करीब 40 कारसेवकों के जत्थे का प्रस्थान 23 अक्टूबर को निश्चित हुआ। कारसेवकों को एक कम्बल, आवश्यक दैनिक उपयोग की वस्तुएं, तीन जोड़ी हल्के कपड़े, चमड़े के जूते,नकदी व एक थैला लाने के लिए निर्देशित किया गया। वहीं 23 अक्टूबर 1990 को सुबह सभी कारसेवकों को देवली बुलाया गया। बाद में पहले जत्थे के कारसेवकों का देवली के छतरी चोराहे पर शहरवासियों की और से मालाएं पहनाकर जुलूस की शक्ल में बस स्टैंड तक विदाई दी गई। तत्समय लोगों ने कारसेवकों को फल, सूखी खाद्य सामग्री भी उपहार के रूप में दी गई।
बाद में कारसेवकों का जत्था रोड़वेज बस से टोंक के लिए रवाना हुआ। दोपहर में जब कारसेवक टोंक रोडवेज डिपो के पास बालाजी के स्थान पर पहुँचे जहाँ कारसेवकों का हुजूम एकत्रित था। लगभग 200 से अधिक कारसेवकों में ” सोगन्ध राम की खाते है, मंदिर वही बनाएंगे” के उदघोष की होड़ मच गई। बाद में आवश्यक दिशा- निर्देशों के साथ संघ कार्यालय से तीन निजी बसों से कारसेवकों का बड़ा दल जयपुर के लिए कूच कर गया। अपरान्ह बाद जब कारसेवकों की बसों ने जयपुर में प्रवेश किया तो सुनसान जयपुर में जगह- जगह जलते टायरों के धुएं ने ये जता दिया कि मामला बेहद गम्भीर हो चुका है। जगह- जगह तैनात पुलिस दल और उत्तेजित वातावरण के बीच सभी कारसेवकों को जयपुर के आदर्श विद्या मंदिर में ले जाया गया। चूंकि राजस्थान में तब भैरोसिंह शेखावत की सरकार थी।
लिहाजा ज्यादा कठिनाई नही आई। देर शाम को अचानक निर्देश आए कि हमे तत्काल रेलवे स्टेशन पहुँचना है और दिल्ली प्रस्थान करना है। जैसे-तैसे कार सेवक रेलवे स्टेशन पहुँचे तो वहाँ बड़ी अफरातफरी का माहौल था। स्टेशन पर तत्कालीन सांसद गिरधारी लाल भार्गव ने दिल्ली जाने वाली लोकल ट्रेन में हमें बिठाने के बाद विदाई दी। सुबह कारसेवकों से भरी ये ट्रेन दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन स्टेशन पर पहुँची तो वहाँ तत्कालीन सांसद रासासिंह रावत कई कार्यकर्ताओं के संग खड़े दिखाई दिए। उन्होंने हमें भोजन के पैकेट, नमकीन आदि सामग्री दी और कहा कि उन्हें नई दिल्ली रेलवे स्टेशन जाना है, जहाँ से लखनऊ जाने वाली गोमती एक्सप्रेस पकड़नी है। समय बेहद कम था। हमारे जत्थे के कारसेवकों ने रेलवे की पटरी के सहारे करीब 7 किमी का सफर पैदल तय किया।
तब नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचे। लखनऊ जाने वाली गोमती एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर तैयार खड़ी थी, बेहद जल्दबाजी में यात्रा टिकटों का प्रबंध हुआ और करीब 2 बजे गोमती एक्सप्रेस रवाना हुई। बोझिल से वातावरण और तनाव भरे लम्हो में ट्रेन लखनऊ के लिए चली तो सब आपस मे खोए हुए से थे। शिखोहाबाद, फिरोजाबाद, टूंडला जंक्शन से ट्रेन लखनऊ की बढ़ रही थी। बोझिल भरे वातावरण को हल्का करने के लिए राजमहल के हमारे साथी प्रहलाद चोधरी ने ” मुरली ” की ऐसी तान छेड़ी तो सभी कारसेवक ही नही ट्रेन में यात्रा कर रहे यात्री भी मंत्रमुग्ध हो गए। चौधरी मुरली बजाने के मास्टर है। हालांकि आज वे हमारे बीच नही है। लेकिन उनकी यादें आज भी हमारे बीच जीवित है। बहरहाल कारसेवकों को चिंता ये थी कि वे कैसे भी हो एक बार अयोध्या के समीप पहुँच जाए…खैर 24 अक्टूबर 90 की रात 8 बजे जब ट्रेन कानपुर सेंट्रल पहुँची तो लगा कि अब दो घण्टे बाद लखनऊ पहुँच जाएंगे…फिर फैजाबाद और फिर अयोध्या..
कानपुर सेंट्रल पर ट्रेन रुकी तो किसी को ये अहसास नही था कि अगले कुछ क्षणों में क्या होने वाला है! यकायक ट्रेन की बोगियों को यूपी पुलिस ने चारों ओर से घेर लिया। हर बोगी जीआरपी पुलिस के घेरे में थी। बोगी से निकलकर भागने की हर कोशिश नाकाम हुई। पुलिस ने हल्के सामान वाले लोगो की तलाशी शुरू कर दी। कारसेवक दिखने वाले सभी लोगो को सामान के साथ ट्रेन से नीचे उतार दिया और घोषणा कर दी कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस के गहन घेरे में हमें रेलवे प्लेटफॉर्म पर ले जाया गया। जहां से किसी को हिलने तक की हिदायत नही थी। 24 अक्टूबर की रात 10 बज चुके थे। मुलायम सिंह यादव की सरकार हरकत में आ गई और लखनऊ जाने वाली सभी ट्रेनों से कारसेवकों की ढूंढकर धरपकड़ जारी थी। मजे की बात ये थी कारसेवकों के जोश व नारों से कानपुर सेंट्रल गूंज रहा था और पुलिस बेबस नजर आ रही थी। कड़ाके ठंड के दौर में हमे प्लेटफॉर्म पर ही पुलिस के घेरे में सोना पड़ा। नींद तो किसी के आंखों में नही थी। लेकिन ठंड से सब दुबके पड़े रहे। अलसवेरे 4 बजे यकायक पुलिस ने हमे उठाया और यूपी रोड़वेज की बाहर खड़ी बसों में बैठने को कहा। कारसेवकों ने भागने की कोशिश भी की। लेकिन असफल रहे। हमे पुलिस के घेरे में बसों में बैठाया ओर उसमें पुलिस के जवानों को भी तैनात किया गया, जिससे कोई कारसेवक फरार न हो पाए। हम सब बसों में बैठ गए और पूछा गया कि कहा ले जा रहे हो तो जवाब खामोशी में मिला। बस चलती रही न दिशा का पता न गांव, शहर का पता.. अनजाने रास्ते और हमारी मंजिल दूर होती नजर आबरही थी। दो दिन से बिना नहाए- धोएं हम चलते रहे बस में। जब कस्बे, गांवों से हमारी बस गुजरती तो कारसेवक नारे लगाते ” सोगन्ध राम की खाते है मंदिर वहीं बनाएंगे ” पर नारों के बावजूद लोगों की कोई प्रतिक्रिया नही दिखती.. ये माहौल हमे स्तब्ध रख रहा था।
हमे आश्चर्य था कि जहाँ देश में राम के मंदिर का ज्वार उठ रहा था, वहीं यूपी के गांव, कस्बे, शहर शांत थे…सूर्यनारायण भगवान की रोशनी फैलने लगी। तब पता लगा कि कौन से शहर आबरहे है। लगभग 2 बज चुके थे। बस फरुखाबाद जिले से आगे फतेहगढ़ की और ले जाया गया। वहीं पता लगा हमे गिरफ्तार कर इसी जेल में रखा जाएगा। जेल के बाहर पुलिस बड़ा जमावड़ा लगा था। आने वाले कारसेवकों को वही उतारा जा रहा था। शाम 4 बजे से कारसेवकों को पुलिस की ओर से बनाई गई फर्द रिपोर्ट के मुताबिक नाम लेकर जेल के भीतर लेबजाया गया। सामानों की तलाशी ली गई फिर कैदियों की सेल की तरफ ले जाया गया………..
कल भी जारी 3


