उपचुनाव में फिर साबित करना होगा जनमत
@राजेन्द्र बागड़ी, वरिष्ठ पत्रकार
Political News 22 जून ( दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) देवली-उनियारा विधानसभा क्षेत्र से सांसद चुनने के बाद अब होने वाले उपचुनाव के लिए राजनीतिक रस्साकशी बढ़ गई है। चूंकि हरीश मीना सांसद बन गए है, लिहाजा ये विधायक की सीट ” खाली” हो गई है। लोकसभा चुनावों में ये बात बड़ी तेजी से चर्चा में थी कि ” सीट खाली” करवानी है।
ये चर्चा किसने शुरू की और कैसे शुरू की। लेकिन अंततः ” सीट खाली” हो गई! लगातार तीन चुनावों में गुर्जर प्रत्याशी हार गए। गत विधानसभा चुनाव में बीजेपी के राजेन्द्र गुर्जर कांग्रेस के हरीश मीना से चुनाव हारे तो 2023 के विधानसभा चुनाव में गुर्जर नेता विजय बैंसला भी हरीश मीना से मात खा गए। लोकसभा चुनाव में फिर हरीश मीना ने टोंक- सवाईमाधोपुर सीट से सांसद का चुनाव लड़ा और हरीश मीना ने दो बार के भाजपा सांसद सुखबीर जौनापुरिया को हरा दिया। कहने का तात्पर्य सीधा है कि इस क्षेत्र से तीन गुर्जर प्रत्याशी चुनाव हारे है। खास बात ये भी है उक्त तीनों गुर्जर प्रत्याशियों को हरीश मीना ने ही हराया।
बीजेपी की लगातार तीन हार ने बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को सोचने पर विवश कर दिया है कि देवली- उनियारा विधानसभा क्षेत्र से गुर्जर प्रत्याशी का प्रयोग क्यों विफल हुआ! विधानसभा के परिसीमन के बाद एक बार गुर्जर तो एक बार मीणा प्रत्याशी जीतते रहे है। लेकिन बीते दो विधानसभा चुनावों से ये गणित गड़बड़ा गई है। लोकसभा चुनाव में तो इस समीकरण ने बीजेपी की आंखे ही खोल दी। अव्वल तो ये सीट जनरल है। लेकिन जातिगत समीकरणों से मजबूर बीजेपी हमेशा एक जाति के प्रत्याशी को ही अहमियत देती आई है। इसी का परिणाम है कि लगातार जाति विशेष के प्रत्याशी को रिपीट करने से आम मतदाता मतदान से विमुख होता गया। बीते विधानसभा चुनाव में बीजेपी लगभग 20 हजार वोटों से हारी तो लोकसभा चुनाव में देवली-उनियारा विधानसभा से 2 हजार 964 वोटो से हारी। ऐसे में सहज ही सवाल उठता है कि बीजेपी का क्षेत्र में जनाधार घट रहा है। ये सीट खाली होने के बाद 6 महीने के भीतर फिर क्षेत्र को एक उपचुनाव भुगतना है, ऐसे में ये सवाल विचारणीय है कि बीजेपी फिर ये सीट जीत भी पाएगी या नही!
बीते चुनावों में बीजेपी क्यों हारी या हराया , ये बहस का विषय हो सकता। लेकिन ये सही है कि बीजेपी के लिए इस सीट को वापस प्राप्त करना कोई आसान काम नही होगा। लोकसभा चुनाव के बाद क़ई प्रत्याशी बीजेपी में शामिल भी हुए और वे उपचुनाव की दौड़ में भी है। ऐसे में सबकी निगाहें बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व पर रहेगी कि पार्टी किसे नया प्रत्याशी बनाती है। कांग्रेस की ओर से मीणा प्रत्याशी जीतने के बाद लगता है कि कांग्रेस परम्परागत जातिगत समीकरणों को किनारे नही करेगी। जातिगत आधार पर कांग्रेस गणित में मजबूत दिखाई देती है। ऐसे में असली चुनौती बीजेपी के समक्ष है कि वह ऐसा उम्मीदवार खोजे जो सीट जीतने के लिए सक्षम हो। सबसे अहम बात ये है कि देवली-उनियारा विधानसभा क्षेत्र में सदैव बाहरी उम्मीदवार थोपे जाते रहे है। क्या इस बार भी ऐसा होगा या बदलाव होगा, यह दिलचस्प होगा।



