-
मुलायम सिंह यादव के अहंकार तोड़ा था कारसेवकों ने
-
सैंकड़ो कारसेवको ने दिया बलिदान
-
देवली तहसील से गया था 40 कारसेवकों का जत्था,
-
9 दिन तक रहे फतेहगढ़ जेल में
(राजेन्द्र बागड़ी, स्वतंत्र पत्रकार)
Special Report 15 जनवरी (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) 33 साल पहले किसी ने कल्पना भी नही की होगी कि अयोध्या में ढांचा गिर जाएगा और वहाँ भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर बन जाएगा। 30 अक्टूबर 1990 की कारसेवा कई मायनों में हिन्दू जनमानस को गम्भीर चुनौती थी, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की सरकार थी और जिसने घोषणा की थी कि ” अयोध्या में कारसेवक तो क्या कोई परिंदा भी पर नही मार सकता” जाहिर था कि तत्समय तथाकथित ढांचे को बचाने के लिए मुलायम सरकार ने कितनी अभेद सुरक्षा व्यवस्था की थी! इसकी कल्पना करना भी मुश्किल था।
ये घटना बड़ी युगान्तकारी थी इसका किसी को अहसास तक नही था। में स्वयं इस कारसेवा का बल्कि इस बड़े आंदोलन का पत्रकार के रूप में चश्मदीद था। आज मेरी उम्र 60 वर्ष की है, लेकिन 33 वर्ष पहले की ये घटना आज भी मेरे मन और मस्तिष्क पर अंकित है। इन पलों को आज फिर नवचेतन कर शब्दों में पिरोने का प्रयास कर रहा हूं, 33 साल पहले की अधिकतम घटना को मैने कड़ी से कड़ी जोड़ने की कोशिश की है फिर भी हो सकता है किन्ही कारसेवकों का उल्लेख या कोई घटना उल्लेख से बच जाए इसके लिए में क्षमायाचना करता हूं। वर्ष 1990 में राजस्थान पत्रिका का पत्रकार होने के बावजूद में विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन जिलाध्यक्ष दिनेश गौत्तम के नेतृत्व में वर्ष 1987 से आरएसएस के सर संघ चालक डॉ. हेडगेवार जन्म शताब्दी समारोह से जुड़ा रहा।
तत्समय देवली के विश्व हिंदू परिषद के पहले अध्यक्ष थे दिवंगत राधाकृष्ण अग्रवाल। हेडगेवार जन्म शताब्दी समारोह ही था, जिसके अंतर्गत ” रामजन्म भूमि पर मंदिर” बनाने की योजना की कल्पना प्रस्तुत की गई। गौत्तम के साथ हमने टोंक जिले के 1052 गांवो में से करीब 750 से अधिक गांवो का प्रवास किया। तत्समय जिला प्रचारक शिवलहरी व विभाग प्रचारक जुगल के कुशल नेतृत्व में इस आंदोलन ने बड़ा रूप लिया। दिनभर रोजमर्रा के काम निपटाना और रात्रि को गांवों में ” दिनेश गौत्तम की राजदूत मोटरसाइकिल “पर कूच करना हर दिन की चर्या थी। गांवो में जब ये बताया जाता कि अयोध्या में रामजी के जन्मस्थान पर मस्जिद बनी हुई है, उस स्थान पर रामलला का मंदिर बनाना विहिप का मुख्य उद्देश्य है तो गांवो के लोगो को बड़ा आश्चर्य होता था। आप कल्पना कर सकते है 33 वर्ष पहले न मीडिया इतना शक्तिशाली था और न संसाधन थे।
खैर हेडगेवार जन्मशताब्दी समारोह के दौरान ही संघ व विहिप ने ” चरण पादुका” पूजन, रामशिला पूजन , हरेक घर से सवा रुपया निधि एकत्रित करने जैसे कार्यक्रमों की रचना की थी। जिसका गांवो तक प्रचार-प्रसार करना, स्वयंसेवकों की टीमों का गठन करना बड़ा काम था। लेकिन दिनेश गौत्तम के कुशल नेतृत्व क्षमता से पहला चरण जैसे तैसे पूर्ण हो गया। गांवो में ये चर्चाएं आम हो गई कि अयोध्या में रामजी का मंदिर बनना चाहिए। तब एक नारा बड़ा प्रसिद्ध हुआ था ” कसो लँगोटो ओर ले लो सोटो अब अयोध्या जाणो है”। ये भजन अतिप्रिय हुआ। जोश बढ़ने लगा। तब तक अयोध्या में मंदिर का शिलान्यास हो चुका था। ये घटना 1989 की है। इस दौरान कई धर्म संसद भी हुई, जिसमें तत्कालीन विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री अशोक सिंहल की अगुवाई में प्रस्ताव पास हुए। आखिर धर्म संसद ने 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में पहली बड़ी कार सेवा का एलान कर दिया। तब देश मे विश्वप्रताप सिंह की सरकार थी। सियासत मंडल कमीशन लागू करना चाह रही थी। जबकि सियासत ने जन्म भूमि आंदोलन को कमंडल की उपाधि से तुलना करनी शुरू कर दी थी। बहरहाल गांवों से लेकर प्रदेश में तरह – तरह की रूपरेखा बनी।
जहाँ मुलायम सिंह यादव की” सत्ता मद” में चूर अयोध्या में एक भी कारसेवक को नही घुसने देने की अहंकार भरी ललकार थी तो विहिप के समक्ष ये बड़ी चुनौती थी। जिलों में कारसेवकों की सूची बननी शुरू हो गई थी। कहा गया था, जो ” रामजी” के लिए अपने प्राण न्योछावर कर सके, वे ही कारसेवा में भाग ले। पेसोपेश की हालत थी। आखिर देवली शहर से पहले जत्थे के कारसेवकों की सूची बनी। जिसमें दिनेश गौत्तम, राजेंद्र बागड़ी, दिवंगत आनन्द अग्रवाल, गिरिराज जोशी, रामेश्वर बाबा, रेवतीरमण जोशी, यशवंत राठौड़, मुन्नाजी ज्ञानी, डीपी विजयवर्गीय, श्योजीराम गुर्जर, दिवंगत प्रह्लाद चोधरी, गोपीलाल गुर्जर, श्याम ग्वाला समेत कई लोग शामिल थे। ये वह पहली कारसेवा थी, जिन्हें अयोध्या जाना था। दूसरा जत्था दिवंगत दामोदर शर्मा की अगुवाई में हमारे जाने के बाद रवाना हुआ था। दूसरे जत्थे में दिवंगत बाबूलाल दीपक, प्रेमचंद शर्मा, दुर्गेश साहू, राजेश मोदी, उगमा नाथ, कोकिला देवी, सियाराम शर्मा, राधेश्याम शर्मा, छोटू पान वाले, सुगन कुमावत, दिवंगत आत्माराम खत्री, सुंदर बिसनानी शामिल थे। निर्देश ये थे कि कारसेवक अपने पास कम से कम सामान रखे, इसके पीछे तथ्य ये थे कि मुलायम सरकार कारसेवकों को गिरफ्तार करेगी। लिहाजा कैसे भी चाहे पैदल चलना पड़े तो चले लेकिन अयोध्या पहुँचना है। मैने तो कम से कम ये कल्पना भी नही की होगी कि कारसेवा में जाने का अवसर मिलेगा लेकिन ” होई वहीं जो राम रुचि राखा” वाली कहावत साबित हुई।

कल भी जारी – 2


