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खजूर का उत्पादन बढ़ाने के लिए “काश्तकारों ” को सुविधाएं, संरक्षण, तकनीकी ज्ञान उपलब्ध कराएं- डॉ. प्रभुलाल सैनी

पूर्व कृषि मंत्री ने गुजरात में कृषि वैज्ञानिकों की “इंटरनेशनल कांफ्रेंस में मुख्य अतिथि के रूप में दिया सम्बोधन


Desk News 30 जून ( दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) हाल ही में 29 और 30 जून तक गुजरात के भुज में भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र के तत्वावधान में आयोजित अंतराष्ट्रीय कांफ्रेंस टेक्नोलॉजी, इनोवेशन एंड सस्टेबल डवलपमेंट समिट में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए राज्य के पूर्व कृषि मंत्री डॉ. प्रभुलाल सैनी ने कहा कि देश मे खजूर की खेती को बढ़ावा देने के लिए जरूरी है कि काश्तकारों को आवश्यक ज्ञान के साथ जरूरी सुविधाएं मुहैया कराई जाए।

इससे देश मे खजूर की खेती काश्तकारों के लिए ही नही देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान की जा सकती है। इससे देश न केवल आत्मनिर्भर बन सकता है, बल्कि काश्तकार भी आर्थिक तौर पर मजबूत हो सकते है। पूर्व कृषि मंत्री डॉ. सैनी सोमवार अपरान्ह वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए आयोजित कांफ्रेंस में उपस्थित देश के कृषि वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों को “एड्रेस” कर रहे थे। उन्होंने करीब 25 मिनट के सम्बोधन में कृषि वैज्ञानिकों को कहा कि पश्चिमी राजस्थान के अलावा भी देश के कई शुष्क स्थानों पर वातावरण के हिसाब से खजूर की खेती संभव है।

ऐसे स्थानों पर कृषि विभाग काश्तकारों को प्रेरित कर किसानों के जीवनस्तर में बदलाव कर सकता है। उन्होंने कहा कि खजूर की खेती के लिए आईसीएआर को गाइडलाइंस तैयार करनी चाहिए, जिससे काश्तकारों को खजूर के पौधो को उगाने, उनका पोषण करने, देखरेख करने, रोग- कीटों से बचाव के लिए आवश्यक जानकारी हो सके। उन्होंने कहा कि देश मे जलवायु के हिसाब से खजूर की खेती किसानों के लिए आत्मनिर्भर बनाने वाली हो सकती है, बशर्तें भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र को मैदान में काश्तकारों को आने वाली दिक्कतों की जानकारी होनी चाहिए। दो दिवसीय समिट के आखरी सत्र में डॉ. सैनी ने कहा कि खजूर की खेती के लिए विभाग प्रयासरत है, लेकिन जो परिणाम धरातल पर आने चाहिए।

वे इसलिए नही आ रहे है कि खजूर के पेड़ उगाने के बाद काश्तकारों को आगे आने वाली समस्याओं के बारे में जानकारी नही है। परिणामस्वरूप खजूर का उत्पादन अपेक्षाकृत कम हो रहा है। अरब देशों में जिस तरह खजूर की खेती होती है, उससे बेहतर तरीके देश मे संभव है। इससे देश खजूर के मामले में न केवल आत्मनिर्भर बन सकता है बल्कि इसका निर्यात करने में भी सक्षम हो सकता है। सैनी ने काश्तकारों के लिए एसओपी बनाने, काश्तकारों को मौके पर तकनीकी सुविधा उपलब्ध कराने पर जोर दिया। इस मौके पर डॉ. सैनी ने कृषि वैज्ञानिकों को बताया कि खजूर की खेती में सबसे बड़ी परेशानी किसानों के सामने तब आती है जब “पोलन प्रोसीजर” (परागकणों) का स्थानांतरण होता है।

किसानो को ये प्रक्रिया समझ मे नही आती और परिणाम ये है कि इससे अपेक्षित उत्पादन नही होता। उन्होंने वैज्ञानिकों को सुझाव दिया कि खजूर की खेती के लिए पोलन प्रक्रिया को अनुसंधान के जरिए आसान बनाया जाना चाहिए, इसके लिए नई तकनीक खोजी जानी चाहिए साथ ही खजूर के विपणन, ग्रेडिंग, पैकेजिंग व मार्केटिंग को भी किसानों के लिए आवश्यक सुविधाये उपलब्ध कराई जानी चाहिए। पूर्व मंत्री ने कृषि वैज्ञानिकों को सबसे बड़ी चुनौती ” राइनो विटल” कीट से बचाव, रोकथाम पर अनुसंधान करने की जरूरत बताई।

उन्होंने कहा आज यह समस्या खजूर के लिए विनाशकारी सिद्ध हो रही है। रातों-रात ये कीट खजूर में प्रवेश कर प्रजनन कर पूरे पेड़ को खोखला कर रहा है, इसके बचाव के लिए नई तकनीक खोज की जरूरत है।

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