Tuesday, April 21, 2026
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HomeBjpआखिर क्यों हारे भाजपा प्रत्याशी जौनापुरिया! लोकसभा चुनाव समीक्षा

आखिर क्यों हारे भाजपा प्रत्याशी जौनापुरिया! लोकसभा चुनाव समीक्षा

@आशीष बागड़ी


Deoli News 4 जून ( दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) वहीं हुआ, जिसकी आशंका थी, कमियां क़ई थी। लेकिन किसी ने उन कमियों को पहचानने की कोशिश नही की और जो फ़ैसला आया। उससे कोई आश्चर्य नही हुआ। टिकट मिलने और मतदान के बाद की परिस्थितियों में कोई खास फर्क नजर नही आया था।

इसलिए उम्मीदे लगभग कम ही थी। बीजेपी का टिकट मिलने के बाद एक बात बड़े जोरों-शोरो से चली कि सीट खाली करवानी है। ये बात अलग है इसे किसने चलवाया और क्यो चलवाया लेकिन इस बात पर आज मोहर जरूर लगी। बीजेपी उम्मीदवार सुखबीर जौनपुरिया अपनी हार के लिए जिम्मेदार है। ऐसा ज्यादातर राजनीतिक पंडितो का मानना है। विश्लेषण की दृष्टि से देखे तो जौनपुरिया बीते 10 वर्षो के कार्यकाल के दौरान एक वीआईपी सांसद ही बने रहे। कार्यकाल के दौरान उन्होंने कभी पूरे लोकसभा क्षेत्र का दौरा ही नही किया। अधिकांश समय उनका टोंक में ही बीता। गाहे-बगाहे भी वे आमजन से मिले हो ऐसा कभी प्रतीत ही नही हुआ।

उनकी 10 वर्ष की सांसदी में वे अपने क्षेत्र के लिए क्या उपलब्धि हांसिल कर पाए, ये तो वे स्पष्ट ही नही कर पाए। मालपुरा में जिला बनाओ आंदोलन से दूरी के बावजूद भले ही उन्होंने बड़ी लीड ली। लेकिन लोगों का रोष तो खदबदा रहा था। जिस टोंक में उन्होंने ज्यादा समय गुजारा, वहीं से वे बड़ी लीड नही ले पाए। सवाईमाधोपुर, गंगापुर सिटी, बामनवास, खण्डार में तो जौनपुरिया ने पैर तक धरने में कंजूसी बरती। यहीं वे विधानसभा क्षेत्र रहे है। जिन्होंने उनका भट्टा बैठा दिया। टोंक जिले की चार विधानसभा क्षेत्रों में से तीन में मामूली लीड ले पाए।जौनपुरिया ने अपने मद में क़ई मोर्चे खोल लिए। मीडिया से मोर्चा तो खोला ही, लेकिन कार्यकर्ताओं को भी राजी नही रख पाए। अपनी कमियों को तलाशने के बजाय जब भी मौका मिला उन्होंने मीडिया को कोसा। आखिर इससे उन्हें क्या मिला, यह वे ही जाने।

ये भी बड़ा कारण रहा कि कार्यकर्ता उदासीन रहा। टोंक जिले में बीजेपी नेताओं से अनबन, गुटबाजी जैसी क़ई विवादित हालातों के जनक भी जौनपुरिया ही थे। विधानसभा चुनाव में उन्होंने देवली-उनियारा विधानसभा क्षेत्र से गुर्जर प्रत्याशी को जिताने के लिए कोई करिश्मा नही कर पाए। टोंक में सचिन पायलट के चुनाव में भी वे बीजेपी प्रत्याशी की कोई खास मदद नही कर पाए। वहाँ मूकदर्शक बना रहना भी उनके लिए मुसीबत का कारण बना। मंगलवार को जब जौनपुरिया के शुरू से ही पिछड़ने के समाचार मिलने लगे तो आमजन को कोई आश्चर्य नही हुआ। इसका सीधा-सीधा मतलब ये ही था कि आशंका पहले थी और वह साबित भी हुई।

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