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देवली-उनियारा उपचुनाव में हार-जीत के समीकरण पायलट- मीना के पिटारे में!

@राजेन्द्र बागड़ी, वरिष्ठ पत्रकार


Political Report 23 जुलाई ( दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) कहते है राजनीति की दिशा व दशा कब बदल जाए, कोई साफ तौर पर नही कह सकता। समीकरण भी ऐसे ही बयां करते है। कभी प्रत्याशी को जिताने के लिए शक्ति लगती है तो कभी हराने के लिए! लिहाजा ये कहना जल्दबाजी होगी कि देवली-उनियारा सीट पर होने वाले उपचुनाव में किस प्रत्याशी को किस पार्टी से टिकट मिलेगा और आखिर कौन विजेता बनकर निकलेगा।

सारे लब्बोलुआब में एक बात महत्वपूर्ण है कि बीते दो विधानसभा चुनावों व बीते एक लोकसभा चुनावों के परिणाम इस बात की जरूर ताईद कर रहे है कि यदि सचिन पायलट और हरीश मीना ने चाह लिया तो जीतेगा, वहीं जो उनके समीकरणों में ठीक बैठता है। यह बात इसलिए मानी जा सकती है कि देवली-उनियारा विधानसभा सीट पर मीणा और गुर्जर जाति की बहुलता है। कांग्रेस के दिग्गज नेता सचिन पायलट गुर्जर जाति में वर्चस्व रखते है और देवली से विधायक का दो बार चुनाव जीत चुके हरीश मीना भी मीणा जाति में अपना व्यापक प्रभाव रखते है। बीते विधानसभा, लोकसभा चुनाव में हरीश मीना ने जिस तरह से जीत हांसिल की है, वह दोनों नेताओं की गठजोड़ का ही नतीजा है।

अब देखिए बीते विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने दिग्गज गुर्जर नेता विजय बैसला को हरीश मीना के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारा, लेकिन बैसला करीब 19 हजार मतों से हार गए। लोकसभा चुनाव में बीजेपी के दो बार के सांसद सुखबीर जौनापुरिया को कांग्रेस से दो बार विधायक रह चुके हरीश मीना के खिलाफ मैदान में उतारा, लेकिन जौनापुरिया मात खा गए। इसमें सबसे गौर लायक तथ्य है कि लोकसभा चुनाव में भी जौनापुरिया देवली-उनियारा विधानसभा क्षेत्र से करीब ढाई हजार मतों से पिछड़े थे। दोनो चुनाव परिणामों से प्रतीत होता है कि देवली-उनियारा सीट पर पायलट-मीना की जोड़ी हार- जीत तय करेगी। हालांकि कांग्रेस के दोनो नेताओं पर ही सारा दारोमदार है कि वे किसे टिकट दे। कांग्रेस में टिकट उसे ही मिलेगा, जिस पर दोनो नेता सहमत होंगे। ये बात अलग है कि वे मानसिक तौर पर क्या चाहते है। देवली-उनियारा सीट हरीश मीना के लिए सबसे मजबूत सीट साबित हुई है और हरीश मीना के लिए भविष्य में भी मजबूत साबित होने वाली है। ऐसे में मीना किसे अपना उत्तराधिकारी चुनेंगे, ये सवाल दिलचस्प होगा।

इस सीट पर मीणा मतदाता निर्णायक है, गुर्जर मतदाता भी बहुलता में है। टोंक जिले में अपने पैर जमाने के बाद सचिन पायलट गुर्जर जाति के मतदाताओं के आइकॉन बने हुए है, यहीं वजह है वे टोंक से लगातार दो बार चुनाव जीत चुके है। कमोबेश ये अंकगणित हरीश मीना की है। गहलोत सरकार में कथित विद्रोह के बाद से हरीश मीना ने सचिन का साथ नही छोड़ा। निवाई में कांग्रेस के प्रशांत बैरवा ने आखरी वक्त पर साथ छोड़ा तो परिणाम सबके सामने है और प्रशांत बैरवा फिलहाल पवेलियन में है। कहने का तात्पर्य ये है कि जो जाति गठजोड़ के समीकरण देवली-उनियारा सीट पर बने है, उन्हें भेदना किसी के लिए आसान नही है। गुर्जर उम्मीदवारों की यदि हार हुई है तो इसके पीछे ये सबसे बड़ा कारण समझा जा सकता है। अब सवाल यहीं है कि बीजेपी के दो उम्मीदवारों की लगातार हार के पीछे क्या कारण है।

यदि जातिगत समीकरण का गठजोड़ नही था तो सरकार विरोधी लहर में बीजेपी ये सीट क्यों हारी! ये ऐसी अबूझ पहेली है, जिसके बारे में बीजेपी नेतृत्व को सोचना होगा। उपचुनाव में फिर वहीं होता है तय मानिए परिणाम भी वहीं आएगा, जिसकी किसी को उम्मीद नही होगी। ये उपचुनाव राज्य सरकार की प्रतिष्ठा का है। दूसरी ओर ये चुनाव पायलट और हरीश मीना की प्रतिष्ठा का भी होगा। पायलट के गृह ज़िले से उपचुनाव हारना उनके आलोचकों के लिए बड़ा मुद्दा बनेगा, ऐसे में पायलट हर संभव प्रयास करेंगे कि ये सीट वापस कांग्रेस हांसिल करें। जबकि बीजेपी के लिए ये सीट वापस हथियाना सरकार के लिए जरूरी होगा। कांग्रेस के लिए उपचुनाव का प्रत्याशी तय करना आसान हो सकता है लेकिन बीजेपी के लिए ये काम बहुत मुश्किल है। गुर्जर-मीणा समीकरणों में उलझी सीट पर निर्विवाद उम्मीदवार का चयन दुष्कर कार्य है। स्थानीयता का मुद्दा ही ऐसा बिंदु है, जो चक्रव्यूह से बीजेपी को बाहर निकाल सकता अन्यथा ये चुनाव बोरियत भरे व निराशा जनक रहने वाले होंगे। बीते दिनों किरोड़ी मीणा और हरीश मीणा के बीच हुई अकस्मात मेलमिलाप भी चर्चा का विषय है। दोनो नेताओं के बीच आपसी प्रतिद्वंदिता है। दौसा सांसद से इस्तीफा देकर कांग्रेस में शामिल हुए हरीश मीना-किरोडी मीणा की कहानियों के लंबे किस्से है। सवाल ये भी कि क्या किरोडीलाल मीणा कोई बड़ा गेम खेल रहे है या खेलना चाहते है, ये भज दिलचस्प होगा। संभावना यह भी प्रतीत होती है कि अबकी बार बीजेपी किसी मीणा उम्मीदवार को टिकट दे दे!

यदि ऐसा संभव हुआ तो सीट के राजनीतिक समीकरण बदल सकते है। लेकिन फिर भी अभी ये कहना आसान नही होगा कि आखिर में किस पार्टी के प्रत्याशी को जीत नसीब होगी। ये बात इसलिए है कि सामान्य रही सीट पर परम्परागत प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों का ये मुकाबला बेहद नीरस रहने का अनुमान है। जातिगत समीकरणों के बीच सामान्य वर्ग के मतदाताओं की भूमिका निर्णायक होगी।

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