उपचुनावों के स्थानों पर फेरबदल संभव
@राजेन्द्र बागड़ी, वरिष्ठ पत्रकार
Political Report 15 अगस्त (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) राजस्थान की 6 रिक्त हुई विधानसभा सीटों पर जल्द चुनावों की घोषणा हो सकती है। उम्मीद है इसी हफ्ते चुनाव आयोग आदर्श आचार संहिता लागू हो सकती है। गौरतलब रहे सांसद बनने से प्रदेश की चौरासी, खींवसर, झुंझुनूं, देवली-उनियारा, दौसा सीटे खाली हुई थी।
जबकि एक बीजेपी के विधायक की आकस्मिक मृत्यु होने से सीट रिक्त हुई है। लिहाजा उक्त सभी 6 सीटों पर उपचुनाव होने है। इसी सम्भावनाओ के चलते उम्मीद है खाली हुई सीटो पर जल्द बड़े अधिकारियों को बदला भी जा सकता है। यह तर्क इसलिए हैं कि विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस सरकार के दौरान लगाए गए अधिकारी अभी भी लगे हुए है। ऐसे में संकेत है कि इसी हफ्ते उपचुनावों की आचार सहिंता की घोषणा से पहले अधिकारियों को बदला जा सकता है। प्रदेश की सभी 6 सीटे बीजेपी सरकार के लिए बड़ी महत्वपूर्ण है। हालांकि इनमें से एक सीट को छोड़कर सभी 5 सीटे कांग्रेस के कब्जे में थी, सवाल है कि उक्त सीटों पर बीजेपी अपना प्रभाव छोड़ पाती है या नही।
बजट में की गई क़ई लोकलुभावन घोषणाओं के बावजूद यदि सरकार इनमें से कुछ सीटे जीतकर कांग्रेस की “ग्रिप” ढीली कर सकती है तो ये बीजेपी के लिए उपलब्धि होगी और ये नही कर पाई तो सरकार की असफलता समझी जाएगी। उपचुनाव की चुनावी सरगर्मियां बढ़ी है, जिताऊ उम्मीदवार की खोज जारी है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि सीटों पर जिताऊ उम्मीदवार नेताओं के कमंडल से नही निकल सकते। उसके लिए पार्टी को आमजनता के विचार जानना जरूरी होगा, अन्यथा अपेक्षित परिणाम नही आएंगे। कांग्रेस हो या बीजेपी दोनो ही दल आमजनता के विचार जानना ही नही चाहते। दोनो ही दलों में गुटबाजी जोरो पर है, सब चाहते है उनके ग्रुप के नेताओं को टिकट मिले।
इन्ही परिस्थितियों के चलते इन दिनों बीजेपी में नेताओ की जगह-जगह बैठके हो रही है। मुद्दा स्थानीयता पर तो आकर टिक रहा है। लेकिन किसी एक उम्मीदवार पर सब एकजुट नही है। महत्वाकांशा बढ़ने के कारण सब अपनी-अपनी भैंसों को छाया में बांधने की आकांक्षा में जुटे है। यहीं वजह है कि देवली-उनियारा सीट पर फिर से बाहरी उम्मीदवार थोपने की तैयारी चल रही है। गौरतलब है कि वर्ष 2008 से लेकर 2023 तक हुए विधानसभा चुनावों के दौरान देवली-उनियारा सीट पर सिर्फ दो ही जातियों का बोलबाला रहा है। कांग्रेस हो या बीजेपी दोनो ही दल उन्हीं जाति के उम्मीदवारों को टिकट देते आये है, ये मिशाल है। बीते 2 चुनावों में बीजेपी लगातार हार रही है।
ये हार का सिलसिला इसलिए भी नही टूट रहा है कि बीते लोकसभा चुनाव में टोंक-सवाईमाधोपुर सीट से फिर बीजेपी की हार हुई है। इन तीन हार के बाद ऐसा प्रतीत होता है, जैसे बीजेपी जीतना ही भूल चुकी है। बहरहाल इस हफ्ते संभवत आचार सहिंता की घोषणा हो सकती है और इसी मद्देनजर प्रशासनिक फेरबदल की सम्भावनाए लग रही है। अब देखना ये है कि ये फेरबदल उपचुनावों वाले स्थानों पर होगा या बड़े स्तर पर होगा।




