राजेन्द्र बागड़ी, स्वतंत्र पत्रकार
Desk Report 28 जनवरी ( दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) बिहार में फिर से ” खेला” हो गया। मरते दमतक वापस एनडीए में नही जाने की कसम के बावजूद नीतीश कुमार फिर से एनडीए के साथ फिर से सरकार बना रहे है। सियासत की कहानी बड़ी अजीबोगरीब होती है। कसमे और वादों का कोई महत्व नही होता। नीतीश की वापसी से इंडिया गठबंधन को भारी धक्का पहुँचा है। ये वे ही नीतीश कुमार है, जिन्होंने विपक्षी एकता के लिए भरसक कोशिश की। करीब डेढ़ साल से बराबर सभी विपक्षी दलों के नेताओं को एकजुट करने में लगे रहे और जब उन्हें ये प्रतीत होने लगा कि वे इंडिया गठबंधन उन्हें कोई तव्वजो नही देने वाले है तो बहाने कुछ भी हो लेकिन आखिर उन्होंने ” पाला” फिर से बदल लिया। इसे यूं समझिए कि मोदी के खिलाफ जो टीम उन्होंने बनाई, उसे उन्होंने ही धता बता दी।
इस घटनाक्रम को देखे तो काफी समय से नीतीश कुमार की इंडिया गठबंधन की बैठकों में उनकी ” बॉडी लैंग्वेज” असहज बता रही थी। उनकी जगह कांग्रेस सब कर्ताधर्ता बनती जारही थी। असल मे नीतीश की मंशा को कोई समझ नही पाए। रही- सही कसर तृणमूल की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने ये कहकर पूरी कर दी कि गठबंधन का संयोजक कांग्रेस से होना चाहिए। इसी बयान के बाद नीतीश ने अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव शुरू कर दिया। पहले लल्लन सिंह को जेडीयू के अध्यक्ष पद से हटाया ओर पार्टी की समूची कमान अपने पास ले ली। लालू की पार्टी से उनकी अनबन यूं तो पहले से चल रही थी लेकिन इसके बाद नीतीश को मौका मिल गया। किसी को इस बात का एहसास नही होने दिया कि वे फिर ” पुराने घोड़े” की सवारी करने को उत्सुक है। बिहार बीजेपी के नेताओं को भी भरोसा नही था कि ” पानी पीकर बीजेपी” को कोसने वाले नीतीश फिर से उनके साथ गठबंधन कर लेंगे।
सियासत रंग बदलने को आतुर हुई तो बीजेपी बिहार भी दंग रह गई। नीतीश की ” डील” जब फाइनल होने के कगार पर थी, तभी बिहार बीजेपी के बड़े नेताओं को दिल्ली बुला लिया गया। तब साफ संकेत मिल गए कि बिहार की ” बहार” बदलने वाली है। खैर बीजेपी के लिए ” नीतीश” फिर से मजबूरी बनकर निकले। बीते 20 बरसों में नीतीश ने ” पलटू राम” बनकर बिहार बीजेपी के समक्ष कोई विकल्प बनने ही नही दिया। सुशील मोदी, सम्राट चोधरी भी विकल्प बन ही नही सके। बीते 20 बरस से ” नीतीश” मुख्यमंत्री रहे। भले ही जेडीयू को पूर्ण बहुमत नही मिला पर मुख्यमंत्री के चेहरे वहीं रहे। इस बार नीतीश फिर 9 वीं बार मुख्यमंत्री की शपथ ले रहे है। सत्य ये भी है कि हर बार पाला बदलकर मुख्यमंत्री बनने वाले नीतीश कुमार ने बिहार में किसी भी दल के मजबूत नेता को उभरने ही नही दिया इसलिए नीतीश आज भी बरकरार है और जब तक उनका समय रहेगा तब तक उन्हें कोई हिला नही पायेगा। बीजेपी का एक तीर कई निशाने– बिहार की सियासत में नीतीश आज भी प्रांसगिक बने हुए है। इंडिया गठबन्धन के मुख्य रणनीतिकार होने के बावजूद वे बीजेपी के लिए लोकसभा चुनावों में महत्वपूर्ण साबित हो रहे थे। हिंदी भाषी बिहार जैसे प्रदेश में लोकसभा की 47 सीटें अत्यंत महत्वपूर्ण थी। बीजेपी ने नीतीश को फिर से गठबंधन में शामिल कर कई निशाने साधे है।
अव्वल तो लालू की पार्टी को घुटनों पर ला दिया तो इंडिया गठबंधन को तोड़ने में भी सफलता प्राप्त की है। इंडिया गठबंधन में पंजाब ने पहले ही कांग्रेस को सीटे देने से इंकार किया तो ममता ने भी वहीं किया। बिहार के निकलने के बाद उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी नेता अखिलेश यादव निश्चित तौर पर ज्यादा सीटें देने के मूड में नही होंगे। अब रही महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना की बात तो बहुत जल्द इन राज्यों में भी कांग्रेस को काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। वैसे भी कांग्रेस के लिए कर्नाटक और तेलंगाना को छोड़कर अन्य कहीं भी ज्यादा गुजाइश नजर नही आती लिहाजा माना जा सकता है कि कांग्रेस के हौसले पस्त है।


