अनटोल्ड स्टोरी कारसेवा- 1990 (अंतिम )
(राजेन्द्र बागड़ी, स्वतंत्र पत्रकार)
Special Story. 19 जनवरी ( दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) अयोध्या को अभेद क़िले के रूप में बदलने के बाद आखिर सेंकडो कारसेवक अयोध्या तक कैसे पहुँच गए, ये सवाल आज भी बड़ा प्रासंगिक है। चूंकि तत्समय हम फतेहगढ जेल में बंद थे। हमारी गिरफ्तारी को 7 दिन बीत चुके थे। ऐसे में हर कोई कारसेवक ये जानने को उत्सुक था कि जहाँ ” परिंदा भी पर नही मार सके” जैसी ललकार के बीच कारसेवक अयोध्या के भीतर कैसे दाखिल हुए और जबदस्त सुरक्षा व्यवस्था के बीच अभेद दीवार को भेदकर कैसे ढांचे तक पहुँचे? ये तत्समय एक बड़ा यक्ष प्रश्न हर किसी के सामने था। 31 अक्टूबर 1990 को प्रकाशित उत्तर प्रदेश के सभी प्रमुख समाचार पत्रों में पहले पेज पर 8 कालम में ढांचे के गुम्बदों पर भगवा लहरा रहे कारसेवकों के फोटो छपे, साफ बता रहे थे कि ” जहाँ परिंदा भी पर नही मार सके” का दम्भ था, उसे कारसेवकों ने इस दम्भ को कैसे तोड़ दिया।
1 नवम्बर 1990 के समाचार पत्र जब हम कारसेवकों को जेल में पढ़ने को मिले तो उस दिन समूचे प्रकरण पर अखबारों ने कई साइड स्टोरी प्रकाशित की थी। जिसमे ये बताया गया कि कारसेवकों ने कैसे विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस के स्वयं सेवकों, रामभक्तों ने मुलायम यादव की योजना को पलीता लगाया। अखबारों ने लिखा था कि एक महीने पहले मुलायम सरकार की हठधर्मिता का पता विहिप के शीर्ष नेतृत्व को लग गया था। आंदोलन से जुड़े योजनाकार जानते थे कि 30 अक्टूबर 1990 को समाजवादी पार्टी की सरकार किसी भी हालत में कारसेवकों को तो क्या किसी भी बाहरी व्यक्ति को अयोध्या में प्रवेश नही होने देगी। लिहाजा आंदोलन के रचनाकारों ने कई तरह की योजनाएं भी बनाई लेकिन सफल वही योजना रही जिसके अंतर्गत कारसेवक अति गोपनीय तरीके से अयोध्या में प्रवेश कर गए।
आंदोलन के रचनाकारों ने ऐसे करीब एक हजार से अधिक कारसेवकों के दल बनाएं, जिसमें 5-6 लोग शामिल थे। ऐसे करीब 150 दलों को रणनीति के तहत 30 अक्टूबर 1990 से एक पखवाड़े पहले ही अयोध्या में प्रवेश करा दिया। इन दलों ने हिंदुओं के घरों में 5 से 6 लोगो की टोलियों के रूप में अपना डेरा जमा लिया। वहीं घरों में रहना और वहीं खाना- पीना। हिन्दू परिवारों ने अयोध्या में कारसेवकों का पूरा ख्याल रखा। जिसकी बदौलत अयोध्या के घरों, मणिराम छावनी, साधु- संतों के डेरो में जमे रहे। योजना ऐसी थी कि कारसेवकों ने ढांचे के चारों तरफ से डेरे जमा लिए थे। सरकार को इस बात का तनिक अहसास भी नही था कि कारसेवक अयोध्या में आचुके है। 30 अक्टूबर 1990 से पहले हफ्ते में सरकार ने कड़ाई बरतनी शुरू कर दी थी। अयोध्या जाने वाले हर रास्तो को बंद कर दिया गया। भारी मात्रा में पुलिस तैनात थी। सशस्त्र बलों के साथ गश्त जारी थी। सड़के सुनसान थी। वातावरण में पुलिस की चहलकदमी ही गूंज रही थी। हालात देखकर कोई अयोध्या के भीतर घुसने की चेष्टा तो छोड़िए कल्पना भी नही कर सकता था।
खैर 30 अक्टूबर 1990 की सुबह 8 बजे के आसपास अयोध्या के घरों, धार्मिक साधु-संतों के आश्रमों में जमे हजारों कारसेवक जब ” जय श्रीराम” के उदघोष के साथ बाहर निकले तो उत्तरप्रदेश सरकार की पुलिस व प्रशासन दंग रह गया। उन्हें अहसास भी नही था कि इस तरह से कारसेवक गलियों से निकलकर बाहर आजायेंगे! सरकार के हिटलरी फरमान के आगे अधिकारी भी नतमस्तक थे। उस दिन हर गली , सड़को पर बर्बरता पूर्ण लाठीचार्ज हुआ, दर्जनों बार आँसू गैस के प्रहार हुए लेकिन कारसेवकों का हुजूम ढांचे की और बढ़ रहा था। कारसेवक घायल होकर जमी पर गिर रहे थे। कारसेवकों के हौंसले के सामने सब पस्त थे। आखिर मुलायम सरकार ने कारसेवको पर गोली चलाने के आदेश जारी कर दिए। जमकर कारसेवकों पर पुलिस ने गोलियां चलाई। सेंकडो कारसेवक शहीद हुए। सेंकडो जख्मी सड़को पर पड़े रहे। लेकिन तत्समय भी अयोध्या वासियों ने घायलों को घरों में शरण दी। आखिर वह वक्त भी आया तब गोलियों की बौछारों के बीच करीब सौ कारसेवक अभेद किले को भेदकर ढांचे के गुम्बदों पर चढ़ गए और मुलायम सरकार को औकात बता दी कि जनसमुद्र के सामने सब व्यर्थ है। ढांचे पर चढ़े कारसेवकों ने भगवा फहराकर बता दिया कि जहाँ ” परिंदे भी पर नही मार सके वहाँ कारसेवकों ने मैदान मार लिया था”।
ये स्टोरी तत्समय के दैनिक जागरण, आज, अमरउजाला , प्रभात किरण, हिंदुस्तान जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में छपी थी। लगभग 2 नवम्बर 1990 तक अखबारों में सरयू नदी में कारसेवकों के नरंसहार, लाशों के फोटो छप रहे थे। तब तक हम फतेहगढ जेल में बंदी थे। देश के हर हिस्से से दंगे, कर्फ़्यू, की खबरे आरही थी। ट्रेन, बसे रुकी थी। यातायात पूरी तरह बंद था। हिंसक घटनाओं के समाचार बराबर रहे थे। आखिर कोई 3 नवम्बर 1990 को सुबह फतेहगढ जेल प्रशासन ने सभी कारसेवकों को रिहा करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। हम सभी कारसेवकों को यूपी रोडवेज की बसों में भरकर पुलिस की कड़ी सुरक्षा में वापस कानपुर लाया गया। जहाँ रात एक विधा मंदिर में बीती। 4 नवम्बर की सुबह कर्फ़्यू के बीच जब हम कानपुर रेलवे स्टेशन पहुँचे तो पता चला कानपुर से आगे की सभी ट्रेनें रद्द कर दी गई है। बसें भी बन्द है। तब हताश होकर हमने घर लौटने का फैसला किया। एक ट्रेन में सवार हुए तो वह ट्रेन दिल्ली के बजाय मथुरा पहुँच गई। नेतृत्वकर्ता दिनेश गौत्तम की अगुवाई में सभी कारसेवको ने फैसला किया कि रामजन्म भूमि नही पहुँच पाए तो क्या कृष्ण जन्म भूमि के दर्शन करेंगे। बाद में सभी कारसेवकों ने मथुरा , वृंदावन में दर्शन करने के बाद मथुरा से सवाईमाधोपुर आए और वही से सब अपने- अपने घरों को विदा हुए।सिर्फ मन मे कसक थी अयोध्या नही पहुँचने की, जो बाद में पूरी हुई।
करीब 33 बरस के बाद 22 जनवरी 2024 को श्रीराम जन्मभूमि पर विशाल मंदिर बनकर तैयार है और अब वहाँ ” रामलला” विराजेंगे, इससे बड़ी कोई खुशी जीवन की नही हो सकती। कई कारसेवक इस दरमियान दिवंगत भी हुए। उनकी कमी हमेशा हमे खलेगी। इस मौके पर सभी दिवगंत साथियों को सजल श्रद्धांजलि।


