Deoli News 19 जनवरी (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) कारसेवक व प्रत्यक्षदर्शी उपतहसील क्षेत्र के भगवानपुरा निवासी सुगनचंद कुमावत के अनुसार पूरे देश में रामशिला पूजन, चरण पादूका पूजन यात्रा निकाली गई। जिसके तहत उन्हें तहसील संयोजक बनाया गया।
इस दौरान उन्होंने रथ बनाकर पूरे तहसील के 140 गाँवों में रथ यात्रा निकाली व धर्म सभा में प्रत्येक व्यक्ति से सवा रूपया इकट्ठा किया। दामोदर प्रसाद शर्मा, रामेश्वर साहू यात्रा के साथ रहे धर्म संसद के फैसले के अनुसार 30 अक्टूबर 1990 को कारसेवा की तिथि तय हुई।कारसेवकों ने भी प्रण किया कि हर हाल मे कारसेवा की जाएगी। पूरे देश से रामभक्त कूच करने लगे देवली से भी दामोदर प्रसाद शर्मा के नेतृत्व में 25 अक्टूबर 1990 को दूसरा जत्था रवाना हुआ। जिसमें सुगनचंद कुमावत, कोकिला बहिन, ज्ञानी पान वाले, रामसिंह शक्तावत कुचलवाडा, हुकम चंद कुचलवाडा, गोपीकिशन वैष्णव, कांशीराम मीणा कुन्देडा, अशोक जैन कासीर समेत कारसेवक सवाईमाधोपुर से रेल में कानपुर के टिकट लेकर रवाना हुए। दिल्ली से टूण्डला स्टेशन पर रेल रोक दी गई।
सभी को वहां इण्टर स्कूल में बंदी बना लिया गया। इस दौरान कारसेवक रात को शौच के बहाने वहां निकलकर पैदल ही 25 किमी आगे निकल गए। सुबह रेलवे सिग्नल पर रेल के बारे में जानकारी कर आगे बढ़ गए।सिग्नल मैन साइकिल से हमे बुलाकर लाया। रेल बैठने के बाद ही सिग्नल दिया। शाम को कानपुर में रेल रोक दी गई। रात को शिशु मंदिर में रहे सुबह जल्दी रेल पकडने के लिए स्टेशन पर पहुचे भारी सुरक्षा के कारण शंका होने पर हमे रोक कर स्टेशन पर बिठा दिया। बाद में पुलिस ने रात को गिरफ्तार कर बसो बिठाकर रवाना कर दिया। फरूखाबाद पहुंचकर बताया कि आपको यहा जेल में रखा जाएगा। वहां पुलिस लाठी चार्ज हुआ। वहीं कोकिला बहिन को राइफल के बट्ट से मारा। सात दिन वहां अस्थाई जेल में रहे 30 अक्टूबर को अयोध्या में कारसेवकों पर गोलियां चलाई गई। जिससे आहत होकर दामोदर शर्मा ने अन्न त्याग दिया।वहां से रिहा होने के बाद रामलला के दर्शन करने अयोध्या रवाना हुए वहां पहुचकर कारसेवको पर हुए अत्याचार का मंजर देखकर संकल्प लिया की रामलला हम आएंगे, मंदिर यही बनाएँगे की प्रतिज्ञा करने बाद दर्शन कर दामोदर शर्मा का उपवास तुडवाकर वापस लौट आए। वापस 6 दिसम्बर 1992 को कारसेवा की घोषणा होने पर फिर कारसेवा के लिए कूच कर। 6 दिसम्बर को सुबह अयोध्या पहुंच गए लाखो लोग मौजूद थे।
कारसेवा शुरू हो चुकी थी। कारसेवकों का जोश देखते ही बनता था। दोपहर 2 बजे तक विवादित ढांचा गिरा दिया गया।वहां अस्थाई मंदिर निर्माण किया। जिसमें एक ईट लगाने का अवसर सुगनचंद कुमावत को भी प्राप्त हुआ। तब वे भव्य मंदिर निर्माण का संकल्प लेकर वापस लौट आए।


