Thursday, April 23, 2026
No menu items!
spot_imgspot_imgspot_imgspot_img
HomeDainik Bureau Deskसांसद होने के बावजूद हरीश मीना की "चुप्पी" का मतलब क्या है!

सांसद होने के बावजूद हरीश मीना की “चुप्पी” का मतलब क्या है!

किरोड़ी लाल बन गए” सिरमौर, समरावता गांव क्यों नही आए मीना

@राजेन्द्र बागड़ी, वरिष्ठ पत्रकार

Political Analysis 20 नवंबर ( दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) करीब एक हफ्ते बाद भी टोंक सांसद हरीश मीना आखिर क्यों चुप है? उनकी प्रतिक्रिया क्या है? समरावता में हुए उपद्रव के बाद घायलों से वे क्यों मिलने नही आए। ऐसे क़ई सवाल है जो इन दिनों राजनीति में चर्चा का विषय बने हुए है। हर कोई ऐसे सवाल दाग रहा है। लेकिन करीब एक हफ्ते का समय गुजरने के बाद भी हरीश मीना की ” शून्यता” बनी रहना रहस्यमय है।

जिसका जवाब मीना ही दे सकते है। उधर सारे प्रकरण में गृहराज्य मंत्री जवाहर सिंह बेडम से मुलाकात हो या सरकार के बीच सवांद सेतु का काम डॉ. किरोड़ीलाल ने मीणा मतदाताओं की सहानुभूति को भुना लिया है। जबकि हरीश मीना मामले में पिछड़ गए है। दरअसल नरेश मीना के देवली- उनियारा विधानसभा क्षेत्र में ताल ठोकने के बाद समूचा परिपेक्ष्य ही बदल गया। नरेश मीणा कांग्रेस से टिकट चाहते थे। लेकिन हरीश मीना के समर्थन नही मिलने से देवली-उनियारा से स्थानीय उम्मीदवार केसी मीणा को टिकट मिल गया। यहीं से नरेश मीणा और हरीश मीणा के बीच चुनाव में आरोपो-प्रत्यारोपण का सिलसिला ऐसा चला कि सारे चुनाव का मुद्दा ही बीजेपी की ओर से भटककर नरेश मीणा पर केंद्रीत होता गया। कांग्रेस की सभाओं में सभी बड़े नेताओं ने नरेश मीणा को मुख्य निशाने पर रखा। जबकि उपचुनाव में बीजेपी सरकार के कामों की आलोचना दूसरी वरीयता पर चली गई।

उधर, नरेश मीणा ने हरीश मीना पर ही अपना फोकस रखा, जिससे हरीश मीना को भी नरेश मीणा के खिलाफ बोलना पड़ा। इस सारी स्थितियों का असर ये हुआ कि चुनाव में मीणा मतदाताओं में खासकर युवाओ में नरेश मीणा ” आइकॉन” बनकर उभरे। जैसे-जैसे नरेश मीणा मुख्य प्रचार में आए, वैसे-वैसे केसी मीणा का पक्ष हल्का होता गया।दरअसल चुनाव को त्रिकोणीय बनाने की रणनीति यहीं से बननी शुरू हुई, जो 13 नवम्बर को समरावता गांव में थप्पड़ कांड के बाद ज्यादा चर्चित हुई। देवली- उनियारा के चुनाव इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां पा गए। थप्पड़ कांड के बाद हुए उपद्रव में वाहनों को जलाने, लाठीचार्ज, ऑंसूगेस, हवाई फायर जैसी घटनाओं के बाद राष्ट्रीय राजमार्ग जाम करने, नरेश मीणा की गिरफ्तारी, मुकदमें दर्ज होने के बाद किरोड़ीलाल मीणा, राजकुमार रोत, विजय बैंसला समेत नेताओ का समरावता आने से ये उक्त गांव राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहा।

चुनाव सम्पन्न होने के बाद सीट पर हार-जीत के दावे नेपथ्य में चले गए और नरेश मीणा ही चर्चित चेहरा बन गए। सवाल ये महत्वपूर्ण नही है कि नरेश मीणा जीतेंगे या नही, बल्कि अब सवाल ये है कि इस रण में कोनसे स्थान पर रहते है। खैर बात चल रही थी हरीश मीना की चुप्पी की तो सवाल ये भी है कि  क्या नरेश मीणा के उभरने से हरीश मीना की साख को नुकसान हुआ है? क्या केसी मीणा हारे तो हरीश मीना की प्रतिष्ठा को धक्का लगेगा? और यदि बीजेपी के राजेन्द्र गुर्जर जीते तो मीणा मतदाताओं के विभाजन की लकीर को हरीश मीना खत्म कर पाने में सफल होंगे, ऐसे क़ई सवाल राजनीति के क्षितिज पर तैर रहे है। हरीश मीना इतने बवाल के बावजूद समरावता नही आने का क्या कारण है, इसका जवाब तो वे ही दे सकते है। लेकिन ऐसा महसूस किया जा रहा है कि हरीश मीना इस बवाल से बचना चाहते है।

समरावता में गहन नाराजगी प्रशासन से है। लेकिन जो कुछ पिछले दिनों नरेश और हरीश मीना के बीच चला, उससे हरीश सम्भवतः नाराज है। प्रचार के आखरी दिनों में तो हरीश मीना प्रचार के परिपेक्ष्य से नदारत दिखे। ये पहला मौका है जब देवली- उनियारा सीट पर मीणा मतदाताओं में विभाजन हुआ है। घटनाक्रम के बाद किरोड़ी लाल जिस तरह से सक्रिय हुए उससे लगता है कि उनके नपे-तुले बयानों के बाद समरावता जाना, गृह राज्यमंत्री को लेकर घटनास्थल पर जाना, जेल में बंद नरेश समेत कई आरोपियों से मिलने के बाद कहा जा सकता है कि किरोड़ीलाल राजनीतिक तौर पर न केवल सिरमौर बनकर उभरे है, बल्कि सरकार, प्रशासन के खिलाफ बने नकारात्मक वातावरण को शांत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जबकि हरीश मीना की चुप्पी से साफ जाहिर है, वे इस राजनीतिक हालातो का फायदा उठाने में पूरी तरह विफल हुए है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

%d