Thursday, April 16, 2026
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HomeDainik Bureau Deskश्रीकृष्ण की लीलाओं और भक्त सुदामा के चरित्र से दिया लौकिक संदेश

श्रीकृष्ण की लीलाओं और भक्त सुदामा के चरित्र से दिया लौकिक संदेश

श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का समापन


Deoli News 3 अप्रैल (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) शहर के एजेंसी एरिया में चल रही श्रीमद्भागवत महापुराण के विश्राम दिवस पर कथा व्यास पं बनवारी लाल शास्त्री ने भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य अवतारों और उनकी अलौकिक लीलाओं का वर्णन किया। आयोजक लक्ष्मण लाल जाट और डॉ. नवनीत चौधरी ने बताया कि कथा के अंतिम सत्र में कामदेव के प्रद्युम्न रूप में प्राकट्य, रति द्वारा पति सेवा और शम्बरासुर वध के प्रसंगों का सजीव वर्णन किया गया।

साथ ही भगवान श्रीकृष्ण के अन्य विवाहों की कथा और भीम के माध्यम से जरासंध के वध की घटना सुनाई गई। राजसूय यज्ञ के दौरान श्रीकृष्ण की अग्र पूजा और अहंकारी शिशुपाल के उद्धार का प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। नारद जी का द्वारिका के महलों में विचरण और हर महल में प्रभु को अलग-अलग लीलाओं में लीन देखकर उनकी शंकाओं के समाधान ने भगवान की सर्वव्यापकता को सिद्ध किया। भक्त सुदामा के प्रसंग पर चर्चा करते हुए कथा व्यास ने एक मार्मिक सत्य उजागर किया। उन्होंने कहा कि हम अज्ञानता वश सुदामाजी को गरीब कहते हैं, लेकिन वास्तव में वह दरिद्र नहीं, बल्कि महान ऐश्वर्यशाली थे। जिसे जगत के स्वामी स्वयं अपने सिंहासन पर बिठाकर अपने अश्रुओं से चरण धोते हों, वह व्यक्ति निर्धन कैसे हो सकता है?

यहां नरोत्तमदासजी के प्रसिद्ध पद “शीश पगा न झगा तन पे” के माध्यम से सुदामा चरित्र का भावपूर्ण चित्रण किया गया, जिसने पांडाल में उपस्थित हर भक्त की आंखें नम कर दीं। इस अवसर पर महेश नर्सिंग होम व महेश्वर हॉस्पिटल के न्यूरोसर्जन डॉ. राघव जिंदल भी कथा श्रवण करने पहुँचे। उन्होंने व्यास पीठ की वंदना की और कथा वाचक का माल्यार्पण कर आशीर्वाद प्राप्त किया। यहां बताया कि भगवान श्रीकृष्ण की दैनिक चर्या का उदाहरण देते हुए यह महत्वपूर्ण शिक्षा दी गई कि प्रत्येक मनुष्य को प्रतिदिन ध्यान और योग के माध्यम से स्वयं को खोजने का निरंतर प्रयास करना चाहिए। कथा के अंत में यदुवंश के संहार और भगवान के अपनी लीला पूर्ण कर श्रीमद्भागवत में प्रतिष्ठित होने का वर्णन किया गया।

कलियुग में भगवत कृपा की महिमा बताते हुए भक्त धन्ना जाट के चरित्र का उदाहरण दिया गया। उनके जीवन से यह प्रेरणा मिली कि यदि हमारा उद्देश्य पवित्र हो, तो सामान्य से सामान्य कर्म भी ईश्वर की सच्ची उपासना बन जाता है। श्रीमद्भागवत का आश्रय लेकर ही जीवात्मा भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को प्राप्त कर सकती है। समापन अवसर पर आरती और प्रसादी का आयोजन हुआ।

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