खीर का भोग लगाने की परंपरा
(धर्म-संस्कृति)
Deoli News 25 अक्टूबर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) शरद पूर्णिमा हिंदू धर्म में विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व रखने वाला अहम पर्व है। आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले इस पर्व पर भगवान श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना, मंत्र-जाप, दान-पुण्य और चंद्र दर्शन की परंपरा है।
स्थानीय पंडितों का कहना है कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धापूर्वक पूजा करने से सुख-समृद्धि, शांति और आध्यात्मिक उन्नति की कामना की जाती है। शरद पूर्णिमा पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा के दौरान घी का दीपक जलाना, पुष्प अर्पित करना और मंत्रों का जाप करना विशेष माना जाता है। श्रद्धालु भगवान विष्णु के मंत्र ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ और माता लक्ष्मी के मंत्र ‘ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः’ का जाप कर परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। इस मौके पर जरूरतमंदों को भोजन कराना, वस्त्र दान करना और सेवा कार्य करना भी पुण्यकारी माना जाता है।
खीर का भोग लगाने की विशेष परंपरा
दरअसल शरद पूर्णिमा पर खीर बनाने और उसका भोग लगाने की परंपरा पर्व का प्रमुख आकर्षण है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस रात 9 बजे से खीर को चंद्रमा की रोशनी में रखने और रात 12 बजे भगवान को भोग लगाकर या अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है। खीर को शीतलता, मिठास, सात्त्विकता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु खीर का भोग भगवान को अर्पित कर परिवारजनों और अन्य लोगों में प्रसाद वितरित करते हैं। इस विशेषकर दमा व श्वास की बीमारी के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है वही रोग नाशक भी है।
चंद्र दर्शन और चंद्रमा के प्रति प्रार्थना का भी महत्व माना जाता है।
शरद पूर्णिमा का पर्व श्रद्धालुओं को भक्ति, सदाचार, दान और सेवा का संदेश देता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सच्ची श्रद्धा के साथ भगवान का स्मरण करने के साथ-साथ जरूरतमंदों की सहायता करना, सत्य का पालन करना और दूसरों के प्रति सद्भाव रखना भी आध्यात्मिक जीवन के अंग हैं। लगभग सभी मंदिरों में रात को चंद्र रोशनी में रखी गई खीर का भोग लगाकर वितरण किया जाता है।


