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HomeDainik Bureau Deskआखिर "राहुल गांधी" कांग्रेस को जीता पाने में क्यों विफल है!

आखिर “राहुल गांधी” कांग्रेस को जीता पाने में क्यों विफल है!

लोकसभा में उनके बयान क्या साबित करते है

राजेन्द्र बागड़ी, वरिष्ठ पत्रकार

Political News 26 नवम्बर ( दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) हरियाणा, महाराष्ट्र और देश मे हुए उपचुनावों में कांग्रेस ने क्यों मात खाई, ये सवाल ज्वलंत है। राजस्थान, उत्तरप्रदेश में हुए उपचुनावों में मिली करारी हार के बाद भी कांग्रेस में सन्नाटा पसरा हुआ है जबकि बीजेपी के हौसले आसमान पर है। ऐसा क्यों हुआ और किन गलतियों की वजह से हुआ, ये कांग्रेस ही नही देश के लोगों के समक्ष पहेली बनी हुई है।

लोकसभा चुनावों में बीजेपी को बहुमत से कम सीटे लाने के मामले में लगातार घेरने वाले समाजवादी नेता अखिलेश यादव और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी फिर से वापसी नही कर पाए। दरअसल कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी उन पुराने मुद्दों पर ही लौट रहे है, जिनका आमजनता से कोई लेना-देना ही नही है। उधोगपतियों को लेकर विरोधाभासी बयान, दलितों की भागीदारी, जातिगत जनगणना जैसे बयान लोकसभा के पटल पर जरूर सुर्खियां पा सकते है लेकिन ऐसे बयान हकीकत में आम जनता में पैठ नही बैठा सकते। मंगलवार को लोकसभा में राहुल गांधी फिर वहीं बोले और कहा कि ” गरीबो का पैसा अमीरों की जेब मे क्यों जा रहा है” पिछले दिनों उन्होंने एक लेख लिखकर स्वंय को पूंजीवाद के खिलाफ नही बताया था लेकिन मंगलवार को वे लोकसभा में फिर उसी ” ट्रेक” पर लौट आएं।

सवाल ये है गरीब हो या अमीर उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति को रोका जा सकता है? वस्तु खरीदी जाएगी तो उसके बदले व्यापारी, उधोगपति को पैसा तो भुगतान ही करना पड़ेगा। ऐसे में राहुल गांधी क्या कहना चाहते है ये स्पष्ट नही हुआ। बड़े उधोगपति देश मे बड़े- बड़े प्रोजेक्ट्स स्थापित करते है और उसी के बदले क्षेत्र की जनता, लोगों को रोजगार मिलता है तो देश की जीडीपी भी बढ़ती है। आज तक ये समझ से परे है कि राहुल गांधी इन हालातों के खिलाफ क्यो है। अगर उनकी कोई “फिलॉसफी” है तो वे संसद में क्यों नही बताते। क्या सरकार अपने स्तर पर इतने बड़ी आबादी वाले देश मे लोगों, युवकों को रोजगार दे सकती है!

खैर ये राहुल गांधी के विचार है और उसे पार्टी जमीनी सतह पर क्यो नही पहुँचा पा रही है, ये विचारणीय हो सकता है लेकिन इस मुद्दे पर देश में चुनाव तो कतई नही जीते जा सकते। हरियाणा में दलित का मुद्दा भी था, रोजगार का विषय भी था फिर भी राहुल गांधी की पार्टी क्यों मात खा गई। महाराष्ट्र में कांग्रेस ने सत्ता के बाहर होने के बावजूद चुनाव लड़ा फिर वहाँ उनके गठबंधन की करारी हार क्यों हुई। राजस्थान, उत्तरप्रदेश में हुए उपचुनावों में कांग्रेस और समाजवादी क्यों मात खाएं! इसका सीधा मतलब है कि कांग्रेस की सोच- विचारधारा देश के लोगो से इतर हो गई है। जिसे या तो कांग्रेस समझा नही पाई या फिर मतदाताओं के समझ- जेहन में नही उतरी। लोकसभा में राहुल गांधी ने कहा कि जिन प्रदेशों में कांग्रेस की सरकार है, वहाँ जनगणना कराई जाएगी। ये उनका फैसला है इसका विरोध कोई क्यो करेगा। सवाल ये है कांग्रेस के पास हिमांचल, कर्नाटक में सरकार है। इसके अलावा झारखंड समेत अन्य राज्यों में उनकी गठबंधन की सरकारें है। राहुल गांधी चाहे तो वहाँ जातिगत जनगणना करा सकते है लेकिन इससे प्रदेश को क्या फायदा मिलेगा ये स्पष्ट नही है। जातिगत मतगणना कराने के बाद भी कोई पार्टी एक समूह के वोटों से चुनाव नही जीत सकती तो फिर ये सौदा कांग्रेस के लिए न केवल बड़ा विवाद का कारण बन सकता है बल्कि कांग्रेस के लिए गले की घण्टी भी बन सकती है।

मोटे तौर पर देखें तो कांग्रेस की चुनाव लड़ने की नीति ही दोषपूर्ण है। रेवड़ियों से चुनाव तो जीत सकते है लेकिन उन्हें पूरा करने में प्रदेश अर्थव्यवस्था दांव पर लग जाती है। कर्नाटक, हिमांचल में जिन दावों पर कांग्रेस जीती, उनमें अधिकाश पूरे नही किए जा सकते। ऐसे में प्रदेशो की अर्थव्यवस्था को धरती पर लाने के लिए कौन जिम्मेदार होगा? राज्यों की भी ओवरड्राफ्ट लेने की एक सीमा है, उसके बाद जो स्थितियां बनती है, वह अत्यंत भयावह ही होगी। जिसकी कल्पना ही की जा सकती है। दिल्ली में केजरीवाल की रेवड़ियां हो या हर माह महिलाओं के खातों में पैसे भेजने के दावे आखिर ये सब अर्थव्यवस्था को जमीन चटाने वाले वायदे ही है। दलित के मुद्दे को लेकर राहुल हमेशा हमलावर रहते है। हाल में हुए चुनावों में इस मुद्दे से कहां फर्क पड़ा, ये समझने की बात है। ये सार्वभौमिक सत्य है कि राहुल गांधी के बयान से कांग्रेस को कभी ज्यादा फायदा नही हुआ।

बल्कि क़ई बार तो खुद कांग्रेस ही घर मे घिर गई। असमंजस के इस वातावरण में कांग्रेस ख़ुद तय नही पा रही है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नही। दिशाहीन नीति और सोच की वजह से देश की पुरानी पार्टी जिस दुर्दशा को भोग रही है, उसके लिए कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व जिम्मेदार है अन्य कोई नही।

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