@आशीष बागड़ी
Political Report 4 नवम्बर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) आगामी 13 नवम्बर को देवली-उनियारा विधानसभा क्षेत्र में होने जा रहे उपचुनाव में खेती-बाड़ी, शादी- ब्याह के सीजन के अतिरिक्त उदासीन चुनावों में मतदान परिणाम बहुत कुछ वोटिंग प्रतिशत पर निर्भर करेगा। ऐसा राजनीतिक जानकारों का मानना है।
एक तरह से ये बात सही भी लगती है कि यदि वोटिंग प्रतिशत कम रहता है तो चुनाव परिणामो में भारी बदलाव संभव है। पिछले कुछ चुनावों के मतदान प्रतिशत का विश्लेषण करें तो देवली- उनियारा विधानसभा क्षेत्र में भाजपा को तभी फायदा मिला है। जब वोटिंग परसेंट 72 फीसदी से ऊपर गया है। इससे कम मत प्रतिशत रहने का कांग्रेस को फायदा हुआ है। वर्ष 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में 72 फीसदी मतदाताओं ने वोट किया परिणाम ये आया कि बीजेपी के राजेन्द्र गुर्जर 53 फीसदी वोट पाकर विजयी हुए। जबकि कांग्रेस को तत्समय 35 फीसदी वोट ही मिले। वर्ष 2018 में हुए विधानसभा चुनावों में 70.45 फीसदी मतदाताओं ने वोट किया। लेकिन चुनाव परिणाम कांग्रेस प्रत्याशी हरीश चंद्र मीना के पक्ष में रहा। तत्समय वे करीब 21 हजार वोटो से जीते।
उस दौरान हरीश मीना 51 फीसदी वोट लेने में सफल रहे जबकि वर्ष 2023 में हुए विधानसभा चुनाव में करीब 68 फीसदी वोट पड़े और कांग्रेस के हरीश मीना फिर से 47 फीसदी मत पाकर चुनाव जीते। उक्त विश्लेषण से प्रतीत होता है कि बीजेपी को तभी फायदा हो सकता है। जब विधानसभा क्षेत्र में 70 फीसदी से अधिक मतदान हो। यदि इस उपचुनाव में 75 फीसदी के आसपास मतदान होता है तो बीजेपी को फायदा संभव है अन्यथा कांग्रेस फिर से सीट हथिया सकती है। जातिगत समीकरणों के आधार पर दोनो पार्टियों ने परम्परागत तौर पर टिकट दिए है, ऐसे में क़ई ऐसे कारण है।
जिनकी वजह से वोटिंग प्रतिशत कम रह सकता है। हालांकि कांग्रेस के बागी नरेश मीणा कितना वोट शेयर ले सकते है। इस पर अभी कुछ नही कहा जा सकता, लेकिन इतना जरूर है कि नरेश मीणा बीजेपी और कांग्रेस दोनो के वोट खा सकते है। युवा मतदाता किस तरफ जाएगा, ये बहुत कुछ निर्भर करेगा। दस नवम्बर से 18 नवम्बर तक ब्याह- सावों की भरमार है। व्यापारी भी व्यस्त रहने है तो खेती- बाड़ी में किसानों के व्यस्त रहने का भी बड़ा कारण रहेगा। ये वे कारण है जो दोनो ही दलों के लिए भारी रहने वाला है। लाजमी है उक्त कारणों से मतदान पर बुरा असर पड़ सकता है और ऐसा हुआ तो सबकी धुकधुकी बढ़ने लगेगी। एक मोटे अनुमान के मुताबिक जीत के लिए प्रत्याशी को करीब 90 से एक लाख वोट चाहिए। लेकिन यदि वोटिंग प्रतिशत कम रहा और मुकाबला त्रिकोणीय बना तो ये अंतर और कम हो सकता है।
दीपावली का पर्व खत्म होते ही दोनो ही दलों की और चुनाव प्रचार में तेजी आने लगी है लेकिन लोग चुनाव को लेकर उदासीन नजर आते है। क्षेत्र में चुनावी हलचले सिर्फ पार्टियों के कार्यालयों तक नजर आती है, इसके अलावा फिलहाल आम लोगों में कोई ज्यादा उत्सुकता नजर नही आती। सबसे बड़ी चुनौती मतदाताओं को घरों से निकाल कर वोट डलवाने की होगी। ये देखना दिलचस्प रहेगा कि किस पार्टी के कार्यकर्ता ये काम कर पाते है।



