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HomeBjpएकजुटता और समष्टि भाव से ही बीजेपी प्रत्याशी की जीत होगी सुनिश्चित!

एकजुटता और समष्टि भाव से ही बीजेपी प्रत्याशी की जीत होगी सुनिश्चित!

बीते समय से लेना होगा सबक

@आशीष बागड़ी

Political Analysis. 20 अक्टूबर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) भूले, गलतियां सभी से होती है, मानव स्वभाव है, लेकिन अगर उन गलतियों को समय के रहते सुधार लिया जाए तो वे लोग इतिहास बनाते है। बीजेपी उम्मीदवार राजेन्द्र गुर्जर भी उन नाइत्तफाकी को दूर कर लेते है तो उनका रास्ता अवश्यमेव ज्यादा आसान हो सकता है।

वर्ष 2013 में विधायक बनने के दौरान हो सकता है, उनमें परिपक्वता की कमी रही हो, लेकिन एक हार और फिर वर्ष 2023 के चुनाव में बाहर रहने के बाद तय है राजेन्द्र गुर्जर ने आत्म मंथन जरूर किया होगा। यदि उन्होंने उसे सुधारने का मन बनाया होगा तो ये उपचुनाव उनके लिए आसान हो जाएगा।वर्ष 2013 से 2018 तक का कार्यकाल उनके लिए भले ही विवादास्पद नही रहा हो, लेकिन उनके इर्दगिर्द लोगों ने उन्हें समष्टि सोच की तरफ जाने ही नही दिया। जिन राजनेताओं पर उन्होंने भरोसा किया, वे ही अवसर आते ही नजरें बदलकर निकल लिए।

जिस वक्त गुर्जर को उनसे सहयोग की जरूरत थी, वे ठेंगा बता गए। सबसे बड़ी खामी उनकी अपने जाति के नेताओं से भी अनबन के रूप में सामने आई। ऐसे सलाहकार सामने आए जिनका ज़मीनी रिश्ता नही था। ऐसे सलाहकारों ने उन्हें डुबोने का काम किया। वरिष्ठ नेताओं के अनुभवों से लाभ उठाने के बजाय उनके बीच दुश्मनी की खाई बढ़ाई। वर्ष 2013 से 2018 तक के कार्यकाल में नगरपालिका की मनमर्जी चली! मलाई लोगों ने खाई और खाली हुए ” दोने” उन पर फेंक दिए। बदनामी किसकी हुई ये कहने की जरूरत नही है।

ऐसे वक्त परस्त नेताओ ने तो फिर से कुर्सी पाने की लालच में पार्टी तक बदलने के लिए समझौते कर लिए ये तो उन लोगों का दुर्भाग्य रहा कि वे बोर्ड से बाहर रह गए अन्यथा कमी तो कुछ भी नही रही। अपनी जाति के नेताओ से प्रतिद्वन्दिता, द्वेषता से भी उन्हें नुकसान ही हुआ है। सबसे बड़ी बात ये है कि राजेन्द्र गुर्जर ने व्यष्टि से समष्टि तक पहुँचने की कोशिश नही की। वे बीते कार्यकाल में कुछ लोगों की जकड़ में ही फंसे रहे। आम जनता से जो जुड़ाव नेता होने के नाते रहना चाहिए, वह नदारत रहा। करीब 125 किमी लंबे विधानसभा क्षेत्र में उन्हें आमजन के बीच पैठ बनानी चाहिए, लेकिन वह हुआ नही। दोनो पक्षों को सुनना और फिर फैसला करते तो शायद उन्हें इतना वनवास नही भोगना पड़ता। राजनीति में वक्त और भाग्य प्रबल होता है, लेकिन सदा नही।

वक्त सबका लौटकर भी आता है, ये किसी को नही भूलना चाहिए। राजनीति और राजनीतिज्ञ दोनो अवसर को देखते है। खुद के स्वार्थ जनता से भी ऊपर चले जाते है तो समझना चाहिए वे पतन के रास्ते जा रहे है। पार्टी का टिकट लेने का सबको हक है, लेकिन टिकट के बाद सारी वैमनस्यता समाप्त होनी चाहिए। राजेन्द्र गुर्जर टिकट प्राप्त करने में सफल रहे, उन्हें बधाई लेकिन उन्हें अभी काफी रास्ता तय करना होगा। लोकतंत्र बदल रहा है। लोगों की सोच भी बदल रही है। इसी के मुताबिक उन्हें अपने को ढालना होगा। चरण वंदना करने वाले लोगों की भाषा भी पहचाननी होगी तो उनका स्वार्थ भी समझना होगा। ऐसे लोगों को पहचानना होगा, जो उनके नाम का दुरूपयोग करते है, जो धमकाने की भाषा का प्रयोग करते है तो फिर ये लोकतंत्र की परिभाषा कतई नही।

अकड़, मकड़ और जकड़ तीनो से बचना चाहिए। उनकी असली परीक्षा तब होगी जब कांग्रेस प्रत्याशी घोषित होगा, क्योंकि मतदान ओर मतदाता ही नेता चुनते है न कि नेता।

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