@राजेन्द्र बागड़ी, वरिष्ठ पत्रकार
Deoli News 10 अक्टूबर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) हरियाणा में अप्रत्याशित जीत के बाद यद्धपि बीजेपी के हौसले आसमान पर है। लेकिन कुछ दिनों में देवली-उनियारा विधानसभा क्षेत्र में होने वाले उपचुनाव के लिए उम्मीदवार का चयन प्रदेश नेतृत्व के लिए भारी असमंजस का कारण बना हुआ है। जातिगत समीकरणों के मिथक से बाहर निकलना और उम्मीदवार का चयन करना बड़ा मुश्किल हो रहा है।
याद दिलाना चाहता है कि वर्ष 2003 में नए परिसीमन के बाद हुए लगभग 4 चुनावों में बीजेपी ने जिन उम्मीदवारो को मैदान में उतारा, वे हार गए। वर्ष 2018 के बाद से तो बीजेपी लगातार विधानसभा, लोकसभा चुनावों में भी हारी और पिछड़ी। ये वे आंकड़े है जो बीजेपी के लिए चिंतन का विषय है। यूँ आंकड़े वार देखें तो 1952 से लेकर 1990 तक उनियारा ठिकाने का वजूद इस सीट पर कायम रहा है। लेकिन उसके बाद वर्ष 2008 के बाद सीट के परिणाम स्थिर नही रहे। ऐसे में ये सवाल स्वाभाविक है कि बीजेपी टिकट में परिवर्तन करेगी या फिर से उसी ट्रेक पर चलेगी? कांग्रेस के हरीश चंद्र मीना के लगातार दो बार विधायक चुनने से बीजेपी के लिए राह कठिन जरूर है, क्योंकि इस सीट पर सचिन पायलट-हरीश मीना के बीच ज्यादा नजदीकियां है। ऐसे में उम्मीदवार के चयन को लेकर जितनी पेशोपेश में बीजेपी है, उतनी कांग्रेस नही है।
सबसे अहम वर्तमान में स्थानीय उम्मीदवार का मुद्दा है। लगभग दो दशक से क्षेत्र में सभी बाहरी उम्मीदवार ही आए और जीते, लेकिन अब हालात अलग है। मतदाताओं में भीतर ही भीतर एक ठीस है और वह है स्थानीय विधायक चुनने की। बाहर से जीते विधायक अधिकाश तौर पर क्षेत्र के प्रति या तो उपेक्षित रहे या इलाकों की जटिलताओं को नही समझ पाए। देवली क्षेत्र हो या उनियारा क्षेत्र दोनो इलाकों में अभी स्थानीय उम्मीदवार की बात जोरो-शोरो से उठ रही है। हालांकि जातिवार आंकड़ो को लेकर भी असहजता इसलिए बनी हुई है कि वे अविश्वसनीय नही है। बीते दो विधानसभा चुनावों व लोकसभा चुनाव में बीजेपी की लगातार हार ने साबित किया है कि आंकड़ो के जाल में फिसलना ठीक नही है। जातियों को संतुष्ट करने की प्रक्रिया में आम मतदाता छिटकता जा रहा है।
बीजेपी नेतृत्व अभी भी इस गहन गुफा से बाहर नही निकल पा रहा है। उपचुनाव में बीजेपी उम्मीदवार का चयन साबित करेगा कि पार्टी जीतेगी या नही! यहीं तथ्य है जो पार्टी के प्रदेश नेतृत्व के समक्ष यक्ष प्रश्न है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि बीजेपी 7 सीटों पर उपचुनाव लड़ रही है। इनमे सोशल इंजीनियरिंग संभव नही लगती! दूसरी बड़ी बात ये है क्षेत्र में जातिवाद के खिलाफ वातावरण है। हरियाणा में जो फैक्टर रहे वहीं देवली-उनियारा सीट में प्रबल रहने वाले है। इस बार उपचुनाव अलग तरह के रहने वाले है। बीजेपी में टिकट चाहने वालों की लंबी कतार है जबकि कांग्रेस में कोई बड़ी मारा- मारी नही दिख रही। जिस खामोशी से कांग्रेस की रणनीति चल रही है, उसकी भनक तक नही लग पा रही है। इन परिस्थितियों में बीजेपी के लिए गम्भीर चुनौती है। गत विधानसभा चुनाव में कांग्रेस विरोधी लहर के बावजूद कांग्रेस के हरीश चंद्र मीना का दूसरी बार लगातार जीत जाना, किसी चमत्कार से कम नही है। लेकिन ये भी सत्य है कि उनके सामने दोनो बार उम्मीदवार कमजोर थे।
बीजेपी इस मिथक को तोड़ पाएगी या नही ये देखना दिलचस्प रहेगा। फिलहाल कांग्रेस जानती है कि बीजेपी की कमजोरी ही उसकी जीत का कारण है। इसलिए शर्तिया कह सकते है कि कांग्रेस पहले उम्मीदवार की घोषणा करने से बचेगी, वह चाहेगी कि बीजेपी पहले उम्मीदवार की घोषणा करें जिससे वह उपजी नाराजगी को वोटों में बदल सके। अंत में ये समझ लीजिए कि यदि बीजेपी तीसरी बार भी जातिवाद के जाल से नही निकल पाई तो चुनाव परिणाम उम्मीदवार की घोषणा के साथ ही आम हो जाएंगे!



