@राजेन्द्र बागड़ी, वरिष्ठ पत्रकार
Desk News 22 मार्च ( दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) हाडौती के प्रमुख गुर्जर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के समर्थक माने जाने वाले प्रह्लाद गुंजल के कांग्रेस में जाने के बाद अब ये विचारणीय हो गया है क्या अब गुर्जर मतदाताओं का रुख कांग्रेस की तरफ होगया है या आने वाले दिनों में गुर्जर मतदाताओं का समर्थन बीजेपी के पक्ष से दूर हो जाएगा!! सूबे की राजनीति में ये एक बड़ा मोड़ है। सियासत के हिसाब से समझे तो पायलट गुर्जरों के बड़े नेता है, उनके बाद अशोक चांदना, धीरज गुर्जर आते है।
हालांकि बीते 5 सालों में पायलट की चांदना से कभी नही बनी लेकिन आज जब जयपुर में गुंजल के पार्टी में शामिल होने के दौरान हुई प्रेस कांफ्रेंस में पायलट को छोड़कर धीरज गुर्जर, अशोक चांदना, प्रहलाद गुंजल के साथ उपस्थित थे। इस मौके पर पायलट का न आना चर्चा का विषय जरूर है। गुंजल ने कांग्रेस में आने का श्रेय अशोक चांदना को दिया। संकेत साफ है कि जयपुर में अशोक गहलोत की उपस्थिति में गुंजल के लिए बहुत बड़ा संकेत है। हालांकि कांग्रेस पार्टी की उक्त प्रेस कांफ्रेंस में कोटा के दिग्गज नेता शांति धारीवाल भी नदारद दिखे।कांग्रेस में उक्त चारों गुर्जर नेताओं का किसी न किसी रूप में वर्चस्व रहा है। हाड़ौती में गुंजल, खेराड में धीरज गुर्जर, बूंदी में अशोक चांदना का काफी प्रभाव है। ऐसे में ये संकेत बताते है कि बीजेपी गुर्जरों के प्रभाव से करीब-करीब दूर हो गई है।
अब बीजेपी में कुछ नाम मात्र के गुर्जर नेता ही बचे है, जिनका सीमित क्षेत्र में ही प्रभाव है। पायलट एक और प्रदेश में गुर्जर नेता के रूप में स्थापित है, वहीं गुंजल की भी हाडौती में गुर्जर जाति में अपनी प्रभावी छवि है। धीरज गुर्जर भी भीलवाड़ा में गुर्जरों के कद्दावर नेता के रूप में जाने जाते है। उनकी हैसियत आलाकमान तक है। अशोक चांदना यूँ तो अशोक गहलोत गुट के माने जाते है। लिहाजा बीते चुनावों में पायलट चांदना के चुनाव क्षेत्र में प्रचार के लिए नही गए। अब देखना ये दिलचस्प होगा कि उक्त चारों गुर्जर नेता कैसे डूबती जा रही पार्टी की नैया पार लगाते है। एक मोटे तौर पर गुर्जर मतदाता राज्य की करीब 40 विधानसभा सीटों पर निर्णायक स्थिति में है। ऐसे में पायलट, चांदना, गुंजल और धीरज कितना प्रभाव डाल पाते है, ये महत्वपूर्ण होगा। गुंजल के बीजेपी से किनारा करने के बाद एक बात तो साफ दिख रही है कि अब बीजेपी में गुर्जर नेताओं की कमी आई है। इसे बीजेपी कैसे लेगी, ये देखने का विषय होगा।
बीजेपी ने बीते विधानसभा चुनाव में गुर्जर आंदोलन के नेता कर्नल किरोड़ी लाल बैंसला के पुत्र विजय बैंसला को देवली-उनियारा से टिकट देकर गुर्जर मतदाताओं को साधने की कोशिश की। लेकिन बीजेपी का ये प्रयास न केवल विफल हुआ बल्कि विजय बैंसला खुद चुनाव हार गए। ऐसे में साबित हो गया कि बीजेपी का ये प्रयोग गुर्जर मतदाताओं को अपने पक्ष में नही कर पाया। यहीं नही विजय बैंसला के पिता कर्नल किरोडी लाल बैंसला भी इसी क्षेत्र से चुनाव हार चुके है। खैर बात गुर्जर समाज के उक्त चारों नेताओं की चल रही है, जो अपने क्षेत्रों में अपना प्रभाव रखते है। टोंक-सवाईमाधोपुर लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस की सीट निकालने की जिम्मेदारी सचिन पायलट ने ली है तो भीलवाड़ा की जिम्मेदारी धीरज गुर्जर के पास है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के खिलाफ गुंजल के उतरने से हाड़ौती में एक बड़ा संदेश गया है। वहीं पायलट, चांदना की प्रदेश में कांग्रेस की नैया पार लगाने की जिम्मेदारी होगी। बीजेपी के लिए खास दिक्कत गुर्जर मतदाताओं को साधने की होगी। बैंसला क्षेत्र में इतना व्यापक प्रभाव डालने में विफल रहे है, ऐसे में जातिगत समीकरणों के हिसाब से कांग्रेस के ये नेता अब पार्टी के लिए कितना कर पाएंगे, ये देखना दिलचस्प होगा। फ़िलहाल हाल में बनी गुर्जर नेताओं की ये चौकड़ी कितना परिणाम दे पाती है इस पर सबकी नजर होगी। इस प्रकरण में पायलट के न आने से क्या संकेत होंगे, ये विषय सोचनीय है। अशोक गहलोत की उपस्थिति में गुंजल के पार्टी में शामिल होने से प्रतीत होता है कि गुंजल जैसे बड़े नेता को शामिल करने में गहलोत ने पायलट को पीछे छोड़ दिया है। आपसी मतभेदों के चलते गुर्जर नेता कैसे मैनेज कर पाएंगे, ये देखना है।
सियासी हलकों में चर्चा है कि गुंजल को कोटा से बीजेपी का टिकट नही मिलने के कारण ये बदलाव सामने आया है। गुर्जर मतदाताओं की लोकसभा चुनाव में अब क्या केमेस्ट्री रहेगी, ये तो आने वाले दिन तय करेंगे। लेकिन गुर्जर जाति के उक्त बड़े नेताओं की आपस की केमिस्ट्री भी किस कदर रहती है इस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा।


