शान्ति सिन्धु व्यक्तित्व परिचर्चा के तीसरे दिन आचार्य शान्ति सागर महाराज के तप, त्याग और धर्म प्रभावना पर हुई चर्चा
Deoli News 24 अक्टूबर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) देवली में शान्ति सिन्धु व्यक्तित्व परिचर्चा के तीसरे दिन मुनि वैराग्य सागर महाराज ने कहा कि जिस पर गुरु का आशीर्वाद होता है, वह कभी भटक नहीं सकता। आचार्य शान्ति सागर महाराज ने धर्म की रक्षा के लिए स्वयं निर्दोष चर्या का पालन किया और अन्य साधकों को भी इसी मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत से उद्भूत धर्म की धारा ने उत्तर भारत के लोगों की ज्ञान पिपासा को शांत किया। देव, शास्त्र और गुरु के अभाव में अनेक लोग धर्म से विमुख हो गए थे, लेकिन आचार्य महाराज ने उन्हें पुनः धर्म से जोड़ा। मुनि सुप्रभ सागर महाराज ने कहा कि आचार्य शान्ति सागर महाराज उग्र तपस्वी थे। उन्होंने अपने 35 वर्ष के संयमी जीवन में 25 वर्ष तक उपवास की कठिन साधना की। समाजोत्थान के लिए उन्होंने भारत की आजादी से पहले ही कोल्हापुर के राजा को प्रेरित कर बाल विवाह निषेध कानून बनवाने में योगदान दिया। उनका अधिकांश समय तप, ध्यान और अध्ययन में व्यतीत होता था। उन्होंने 18 करोड़ महामंत्रों का जाप किया।
उनकी साधना और आध्यात्मिक परंपरा का ही प्रभाव है कि उनकी शिष्य-प्रशिष्य परंपरा में आज भी एक हजार साधु विहाररत हैं। कार्यक्रम में गुरु भक्ति के लिए झांतला, बूंदी, धनगांव, सिलोर और लाखेरी से समाज के लोग देवली पहुंचे। इस दौरान गुरु पूजन का लाभ श्री शांतिनाथ दिगंबर मंदिर के भक्तजनों को प्राप्त हुआ। आचार्य शान्ति सागर महाराज के जीवन और उनके योगदान पर सत्यनारायण जैन, महावीर जैन (चांदली) तथा इंदौर से पं सुरेश मारोरा ने प्रकाश डाला।



