स्थानीय मुद्दे उठाने वाला जनप्रतिनिधि नही, देवली के विकास को लगी नजर
@राजेन्द्र बागड़ी, वरिष्ठ पत्रकार
Political Report 8 अगस्त (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देवली टोंक जिले का सबसे सुंदर शहर होने के बावजूद ” राजनीति” का शिकार बन रहा है। विधानसभा से लेकर संसद तक कोई देवली शहर और उसकी सीमाओं के भीतर समस्याओं के बारे में कोई आवाज उठाने वाला जनप्रतिनिधि नही है।
चार जिलों की सीमाओ के बीच विस्तार के लिए छटपटा रहे शहर को ” ऊँट के मुंह मे जीरा” जितना भी हासिल नही हुआ है, चाहे राज्य बजट की घोषणाएं हो या फिर केंद्र बजट के प्रस्ताव हो, सबका नतीजा एक ही रहा है। ये सिर्फ इसलिए हैं कि क्षेत्र की समस्याओं को सदन में रखने वाला कोई स्थानीय जनप्रतिनिधि न पहले था और न अब है। ध्यान दीजिए जब पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत प्रदेश में नए जिलों का गठन करने जा रहे थे, तब भी इस मुद्दे को किसी ने गम्भीरता नही उठाया। परिणामस्वरूप देवली के बजाय केकड़ी, शाहपुरा जिले बन गए। लेकिन देवली जिला नही बन सका। विधानसभा चुनाव हुए और कांग्रेस जीत गई। जिला बनना इसलिए जरूरी था कि देवली शहर की सीमाएं जिलों से सटी है। नगरपालिका की सीमाएं सिकुड़ रही है।
शहर का विस्तार अन्य क्षेत्रों में करना मजबूरी बनती जा रही है। कानून और व्यवस्था, प्रशासनिक नियंत्रण, राजस्व जैसे क़ई महत्वपूर्ण विषयों पर शहर में क़ई विसंगति है, उनका निराकरण सिर्फ देवली को जिला बनाने से हो सकता था। इसी से शहर का सीमा विवाद भी सुलझता। लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में सब का सब आज भी उलझा हुआ है।
आखिर क्या मिला देवली को
खैर देवली को क्या मिला तो हिसाब लगाइए न एडीएम, एसीजेएम कोर्ट खुली न एडीजी और न सीमा विवाद का हल निकला। कृषि मंडी दूर चले जाने के बाद शहर के बाजार सूने हो गए। देवली में गौण मंडी पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। रेल लाने के मामले में एक वर्ष पूर्व जलिन्दरी से नसीराबाद तक रेलवे ट्रेक बिछाने का प्रस्ताव भी आया था और उसके सर्वे पर करीब एक सौ करोड़ स्वीकृति भी हुई। लेकिन नतीजा फिर वहीं का वहीं है।
उल्लेखनीय है कोटा से अजमेर के बीच रेल ट्रैक नही होने से यात्रियों को लंबा चक्कर लगाकर आना पड़ रहा है। लेकिन इस मुद्दे को उठाने वाला फिलहाल तो कोई नही है। ये बात भीलवाड़ा के स्थानीय सांसद दामोदर अग्रवाल के उस बयान से साबित भी हो रही है। उन्होंने बुधवार को दिल्ली में रेलमंत्री अश्वनी वैष्णव से मुलाकात कर नाथद्वारा-राजसमन्द-गंगापुर- भीलवाडा-बनेड़ा-शाहपुरा-केकड़ी- टोडारायसिंह तक रेल ट्रैक बिछाने को लेकर मांग पत्र सौपा है। इसी से लगता है कि देवली के अस्तित्व को लेकर कोई गम्भीर नही है। जबकि देवली यातायात का प्रमुख केंद्र है, ऐसी स्थिति में क्षेत्रीय हिसाब से देवली को तरजीह मिलनी चाहिए लेकिन कोई राजनीतिक दल के प्रतिनिधि इस मुद्दे को नही उठा पाए है, जो बड़े दुर्भाग्यपूर्ण बात है। हाल में नोर्म्स के मुताबिक देवली में एडीजी, एसीजीएम कोर्ट खुलने की संभावना थी पर अभिभाषकों के लंबे आंदोलन के बावजूद नही खुले है।
जबकि देवली-दूनी कोर्ट के मामलों को मिलाकर सभी वर्ग के करीब साढ़े तीन हजार मुकदमे विचाराधीन है। दुःखद तथ्य है इन सबके बावजूद देवली देखता ही रह गया और कोर्ट उनियारा में खोलने की घोषणा हो गई। सभी हालातों के बीच सवाल एक ही है कि राजनीतिक तौर पर देवली को क्यों उपेक्षित रखा जा रहा है और क्यों? कुल मिलाकर कहे तो देवली स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व के अभाव में ” बेचारा” बन गया है। जातिगत समीकरणो के बीच राजनीति का खेल चल रहा है। क्षेत्र के अधिकारों को विस्मृत किया जा रहा है। आने वाले कुछ महिनों में देवली-उनियारा में उपचुनाव भी होने है, ऐसे में सरकार किन मुद्दों को लेकर फिर जनता के बीच वोट मांगने आएगी, ये बड़ा विचारणीय सवाल है।



