अनटोल्ड स्टोरी, कारसेवा-1990 (3)
(राजेन्द्र बागड़ी, स्वतंत्र पत्रकार)
Special story. 17 जनवरी (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) 25 अक्टूबर 1990 का दिन था, जब हम कारसेवक फतेहगढ़ जेल में बंद हुए। फतेहगढ़ जेल उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद जिले में स्थित है। करीब 17 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैली इस विशाल जेल परिसर के बारे में हम पहली बार परिचित हुए। जेल में कैदियों से खेती, हथकरघा जैसे अनेक काम करवाएं जाते थे। सेंकडो बीघा ज़मीनों पर विभिन्न प्रकार की खेती भी होती थी। खैर जब हम जेल के भीतर गए तो एक समस्या खड़ी हुई। गिरफ्तारी की फर्द सूची में राजमहल निवासी श्योजीराम गुर्जर का नाम चढ़ने से रह गया। यूं श्योजी गुर्जर हमारे साथ ही थे।
लेकिन उनका नाम गिरफ्तारी की सूची में नही चढ़ पाया। अलबत्ता जेल प्रशासन ने उन्हें लेने से मना कर दिया। स्थिति पेशोपेश वाली बन गई। हमने श्योजी गुर्जर को जेल में लिए बिना भीतर जाने से इनकार कर दिया। जिससे जेल प्रशासन ने हमे खूब समझाने का प्रयास किया। लेकिन हम सब अड़ गए। बाद में जेल प्रशासन ने हमें जबरन जेल के भीतर ठूंस दिया। बाद में श्योजी को विहिप के जिलाध्यक्ष दिनेश गौत्तम ने नकद राशि देकर वापस गांव लौटने को कहा। लेकिन श्योजी भी अड़ गए। बहरहाल श्योजी को समझा बुझाकर वहीं से घर लौटने की अपील की और हम सब जेल के भीतर लौट गए। जेल में कैदियों को रखने वाली ” सेल” हमने पहली बार देखी। बड़ी- बड़ी सेल.. छत इतनी ऊंची की ताकते रह जाए। ऐसी दर्जनों सेल .. जिनमे हजारों कैदी। सजायाफ्ता कैदी जो सफेद कच्छे व बनियान में जिन्हें ” कच्चा कैदी” और जो पीले रंग के कच्छे, बनियान में उन्हें ” पक्का कैदी” बोला जाता था।
कच्चे कैदी का मतलब उनकी सजा विचाराधीन और पक्के कैदी का मतलब जिनकी सजा मुक़र्रर हो चुकी हो। जेल की सेल में पक्के ” मुटॉम” बने उन्हीं पर सोना और वहीं शौचालय। मारे बदबू के जीना दुश्वार.. इसके अलावा कोई सुविधा नही। आखिर हमने खुले में रुकना मंजूर किया। कारसेवकों ने हल्ला मचाया तो बाद में टेंटो की व्यवस्था हुई। एक सफेद चादर बिछाने को ओर एक कम्बल ओढ़ने को दिया गया। शाम को जब भोजन की घण्टी बजी तो सब पंगत में बैठे लेकिन जब जली- अधकची , बिना नमक की रोटियां, बिना मिर्ची की दाल परोसी तो एक ग्रास तोड़ते ही थूकने लगे। बाद में करीब 5 हजार से अधिक कारसेवकों ने भोजन ग्रहण करने से इनकार कर दिया और जेल में हड़ताल शुरू कर दी। बाद में जेल के अधिकारियों का दल बात करने आया। करीब 2 घण्टे तक चली वार्ता में ये शर्त जेल प्रशासन ने मानी कि कारसेवकों के भोजन व्यवस्था में देवली निवासी और पेशे से हलवाई रामेश्वर बाबा व्यवस्था देखेंगे। खैर ये हो गया, लेकिन जेल का खाना तो जेल का ही होता। कुछ सुधार हुआ और काम चलने लगा। शाम को हर दिन जेल में शाखा लगती थी, जिसमे संघ के गिरफ्तार पदाधिकारी कारसेवा से सम्बंधित सूचनाएं देते थे। बाद में भोजन के बाद आपसी वार्तालापों का दौर चलता। रामजी के भजनों से वातावरण गूंजता था। फिर सवेरे सुबह 6 बजे उठाकर कारसेवकों को मैदान में शाखा के लिए लेजाया जाता और हरदिन भगवान श्रीराम कीर्तन, सूचनाओं का आदान प्रदान होता था।
जेल में तीन दिन बीत गए। ये कोई 27 अक्टूबर 1990 की बात है। शाखा में अखिल भारतीय मजदूर संघ के शीर्ष नेता दत्तोपंत ठेंगड़ी भी हमारी जेल में गिरफ्तार होकर आए। उसी दिन कानपुर के सांसद संघप्रिय गौत्तम भी आए। बाद में साध्वी ऋतम्भरा के गुरु युगपुरुष परमानन्द महाराज भी हमारी जेल में गिरफ्तार होकर आए। इन बड़े नेताओं, धार्मिक गुरुओं के रोज प्रवचन , बौद्धिक सुनने की आदत पड़ गई। अयोध्या में जनज्वार फैलने लगा था। बाहर की खबरों को जानने के लिए अखबार जरूरी थे। बाद में वहां के अखबारों ने हमे नियमित अखबार भेजे जो पिकअप में भरकर रोज आते थे। हर कारसेवक को दो अखबार प्रतिदिन दिए जाते। जिसमे अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, हिंदुस्तान जैसे अखबार उपलब्ध थे। अखबारों में पढ़ते थे आज यूपी के फ़ला शहर में इतने कारसेवक गिरफ्तार हुए, कई जगहों पर रेले रोक दी गई। बड़े नेता गिरफ्तार किए जा रहे थे लेकिन सबसे अहम खबर ये थी कि इस बड़े आंदोलन के अगुआ विहिप के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री अशोक सिंहल भूमिगत थे। पुलिस व प्रशासन उन्हें खोजने के लिए आकाश पाताल एक किए हुए था लेकिन सिंहल का कोई सुराग नही मिल रहा था। मुलायम सिंह यादव सरकार आंदोलन विध्वंस करने के लिए अशोक सिंहल को गिरफ्तार करने की कोशिश में जुटी थी लेकिन हर दिन सिंहल का नया निर्देश अखबार में छपता था। वहीं 30 अक्टूबर 1990 को सुबह 11 बजे कारसेवा के लिए नियत था। तारीख 29 अक्टूबर थी। कारसेवकों में बाहर भी भारी उत्साह था तो भीतर भी आशा थी कि हो ना हो 30 अक्टूबर को कारसेवा जरूर होगी! अयोध्या जाने वाले सभी कच्चे- पक्के रास्तो को सीज कर भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया। कुलमिलाकर अयोध्या अभेद्य किले में परिवर्तित हो चुकी थी। फिर भी हमे रोज अखबारों में खेतों, जंगलों में से गुजरकर अयोध्या जाने वाले कारसेवकों के हुजूम के दृश्य छपे दिखते थे।
तब तक फतेहगढ़ जेल में करीब 15 हजार कारसेवकों को गिरफ्तारी हो चुकी थी। फतेहगढ जेल में तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल , राजस्थान, मध्यप्रदेश समेत राज्यों से कारसेवकों को गिरफ्तार लाया गया।जेलें फुल हो गई। स्कूलों, कालेजो को अस्थाई जेलों का रूप दिया गया लेकिन कारसेवकों की संख्या बढ़ती जारही थी। उत्तर प्रदेश के शहरों, कस्बो, गांवो से भारी कारसेवक उमड़ पड़े थे। इसी दौरान दिनेश गौत्तम का फेमस गीत ” कसो लँगोटो और ले लो र सोटो अब अयोध्या जाणो है” की बड़ी धूम मची थी। कानपुर शहर से बड़ी संख्या में लोग आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई के बहाने जेल आते थे और गीत सुनकर आनंदित होते थे। विभिन्न राज्यों के लोग, विभिन्न भाषाएं इसके बावजूद सबका एक ही ध्येय। 29 अक्टूबर 1990 की सुबह फिर रोजमर्रा की तरह शाखा लगी कारसेवकों पर पुलिस की बर्बरता का कहर टूट रहा था लेकिन रामभक्त कम नही हो रहे थे। इसी दिन दूसरे जत्थे में देवली निवासी मास्टर दामोदर शर्मा हम सब कारसेवकों से मिलने फतेहगढ जेल गए तो उन्हें देखकर सभी को प्रसन्नता भी हुई और सुखद आश्चर्य भी। उन्होंने बताया कि वे गिरफ्तार नही होंगे।
उन्होंने बताया कि इटावा में उन्होंने रेल रोको आंदोलन चलाया। वहा पुलिस ने बर्बरता दिखाई तो वे भाग निकले। उन्हीं के साथ गए प्रेमचंद शर्मा, कोकिला बहिन घायल भी हुए।


