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“रामज्योति” से प्रज्वलित हुई है ” राष्ट्रज्योति”

(राजेन्द्र बागड़ी, स्वतंत्र पत्रकार)

Special Report 22 जनवरी (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) आज का दिवस नव्य भी है और भव्य भी। अद्भुत भी है तो अदभुत भी है। धर्म से आलोकित है तो संस्कृति से अलौकिक भी है। विभन्नताओ से एकता का सूत्रपात्र भी है तो मर्यादाओं की तहरीर भी है। अनेक उपमाओं सजी ये इबारतवाला ये दृश्य शायद कई पीढियां नही देख पाएगी। देश मे उमड़े ” राममय” भावना के इस जनज्वार की आंधी एक नया इतिहास लिखने जारही है। ये इतिहास हिन्दू धर्म के लिए एक नूतन दीपावली के समकक्ष है। इन दिव्य लम्हों को शब्दों में बांधने का प्रयास निर्रथक है। समूचा वातावरण अपने आराध्य के चरणों मे समर्पित है।

करीब पांच सौ वर्षों की सांस्कृतिक गुलामी से आजाद होने जैसा है। देश के रग-रग और रोम- रोम में बसे सबके आराध्य भगवान श्रीराम के अयोध्या में प्राणप्रतिष्ठा की ये घड़ी अतुलनीय है। रामजी सबके है रहेंगे लेकिन दुखद पहलू ये था कि रामजी सबके थे तो वे जन्मस्थान के एक मंदिर में क्यों नही थे।  ऐसा सवाल हर किसी को क्यो कचोटता था। जन्मस्थान को लेकर वहाँ मुगल आक्रांताओं की निशानी को क्यों इतने वर्षों तक मंजूर किया ! क्यों सब धीर धरे बैठे रहे! ऐसे कई सवालों का जवाब 22 जनवरी को मिल रहा है। ये दिन इतिहास में सदैव याद रखा जाएगा। सबके ह्रदय में निवास करने वाले प्रभु श्रीराम को उनकी नगरी में जन्मस्थान दिलाने में हमारी राजनीति क्यों विफल रही, ये विचारणीय है। वर्षो तक क्यों हमारी राजनीतिक विचारधारा सुषुप्त पड़ी रही। वोट बैंक की राजनीति के समक्ष राजसत्ताओं को क्यों समपर्ण करना पड़ा।

किसी को ये विचार क्यों नही आया कि देश धर्म और संस्कृति की आत्मा से प्रज्वलित होता है न कि तुस्टीकरण की ज्वाला से। जो देश अपनी सांस्कृतिक पहचान को भूल जाएं तो उसका पतन अवश्यभावी है। करीब 63 वर्षो तक हम अंग्रेजियत के गुलाम रहे। धर्म तिरोहित हो गया। धर्मनिरपेक्षता के छद्दम वेश में चलते रहे। धर्म लुप्त होता है तभी नया अवतार प्रकट होता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने सही तो कहा है ” यदा- यदा ही धर्मस्य.. ग्लानि भवर्ति ..” तो क्या देश एक नए पुनरुत्थान की और जारहा है तो सच मानिए हम एक नए सांस्कृतिक पुनरुत्थान की और बढ़ रहे है। देश की रामज्योति प्रज्वलित हुई है तो ये सत्य है कि देश की आत्मा भी प्रज्वलित हुई है। सच मे रामनाम ही सत्य है और सदैव रहेगा। इस आंदोलन के प्रणेता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है। उसी की एक इकाई विश्व हिंदू परिषद ने इस आंदोलन को न केवल जन-जन तक पहुँचाया बल्कि राजसत्ताओं को मजबूर भी किया कि देश ” आस्थाओं” पर कोई समझौता नही चाहता। आरएसएस ,विश्व हिन्दू परिषद की एक परिकल्पना इसी दिन की थी। आज वह पूरी हुई है। एक ऐसी ज्योति से जो ” जन जन के आराध्य ” है। इस परिकल्पना की आहट वर्ष 1988 में बनी थी। ये वह समय था, जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पहले संघ चालक डॉ हेडगेवार जन्म शताब्दी समारोह की शुरुआत की। मैने इस कार्यक्रम में करीब एक वर्ष तक भाग लिया और टोंक जिले के 1062 गांवो में से करीब 3 सौ गांवों में दस्तक दी। इसी कार्यक्रम में गांव के लोगों को बताया गया कि अयोध्या में भगवान श्रीराम के जन्मस्थान पर कैसे मुगलकाल में विदेशी आक्रांताओं ने मंदिर को ढहा कर वहां मस्जिद का निर्माण किया और देश की सांस्कृतिक विरासत को धूल-धूसरित किया।

आंदोलन की भूमिका में ही अधिसंख्य लोग इस तथ्य से अनभिज्ञ थे। खैर विहिप के अंतराष्ट्रीय महामंत्री अशोक सिंहल की अगुवाई में रामजन्म भूमि मुक्ति आंदोलन दिन- दिन पंख लग गए। “राम चरण पादुका पूजन” “रामशिला पूजन” “मंदिर निर्माण निधि एकत्रीकरण”  “शिलान्यास” ” कारसेवा 1990, 1992 का इतिहास इस कदर लिखा गया कि सत्ता  मठाधीशों के मठो की दीवारें ढहने लगी थी। सत्ताएं बदलने लगी थी। चूंकि बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रामरथ यात्रा निकाली तब से लेकर अब तक बीजेपी का स्टैंड कायम रहा। दुखद तथ्य ये रहा बीजेपी को छोड़कर सभी दल हिंदुओ की भावनाओं को समझ पाने में विफल रहे। गुजरात के गोधराकांड के बाद तो अयोध्या में राममंदिर बनने की आशाएं नरेन्द्र मोदी टिक गई। वर्ष 2014 में जब ये नारा लगा था कि ” सिंहासन खाली करो आरहे है भगवा धारी”  पर तब भी राजनीतिक दल इस बात का एहसास नही कर पाए कि देश की राजनीति बड़ी करवट लेने वाली है। आखिर मोदी देश की गद्दी पर कायम होगए। तभी से नई उम्मीदे जन्म लेने लगी थी। हर काम का वक्त प्रकृति तय करती है। समय भी आया और इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी आ गया। कोरोना की महामारी तब कोहराम मचा रही थी, तब वर्ष 2020 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अयोध्या पहुँचकर निर्माण की आधारशिला रख दी और 22 जनवरी 2024 को भगवान श्रीराम विशाल मंदिर में प्रतिष्ठित हो रहे है। पूरा देश राममय है। जन जन आल्हादित है, प्रफुल्लित है। गांवो, शहरों, कस्बों में भगवा लहर के बीच अपने आराध्य का स्वागत हो रहा है। ये क्या देश की जनज्योति प्रज्ज्वलित होने के संकेत नही तो क्या है। रामज्योति के प्रज्ज्वलित होते ही देश की आत्मा प्रज्ज्वलित हो चुकी है। ये राम की ज्योति हर जन जन के ह्रदय में स्थापित हो चुकी है। सच मानिए अब देश की दिशा और दशा में बहुत बड़ा बदलाव आनेवाले दिनों में सामने आएगा। प्रधानमंत्री मोदी इसके लिए बधाई के पात्र है। विरोध करने वालों का काम विरोध करना रहेगा पर उनकी भाषा, संकेत पर देश मे कोई ध्यान देने वाला नही होगा, ये भी सत्य है। सत्ताओं की भीड़ में मोदी ही ऐसे प्रधानमंत्री है, जिन्होंने देश को धार्मिक स्वतंत्रता दिलाई है। मंदिरों में जाकर धार्मिक अनुष्ठान करने वाले वे पहले प्रधानमंत्री है। संस्कृति को जीवंत करने वाले वे पहले प्रधानमंत्री है। बरसो से लटके विवादित मामलों का निस्तारण करने वाले वे पहले प्रधानमंत्री है। रामलला को विशाल मंदिर प्राण प्रतिष्ठित करने वाले भी पहले प्रधानमंत्री है। मोदी ने वह कार्य कर दिखाया है जो असंभव था। ये रास्ता भले ही कोर्ट के आदेश से हुआ लेकिन मोदी की प्रतिबद्धता तो साबित हुई है। उन हजारों हुतात्माओं को भी नमन है, जिन्होंने अपने प्राणोत्सर्ग किया। जो इन क्षणों से दूर रहे वे अभागे है।उमंग और उल्लास के इन क्षणों में सभी को कोटि – कोटि नमन। श्री रामलला का कोटि- कोटि नमन।

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