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आखिरी रात में बन-बिगड़ सकते है जीत के समीकरण
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प्रचार थमा, अब घर-घर संपर्क और बूथ मैनेजमेंट पर जोर, खामोश है मतदाता
@राजेंद्र बागड़ी
Deoli News 8 सितंबर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) आखरी रात हमेशा भारी होती है, ये मिजाज शहर के कई बीते नगर पालिका चुनावों का रहा है। चूंकि 9 सितंबर को वार्ड पार्षदों के लिए मतदान होना है जाहिर है 8 सितंबर की रात हर वार्डो के लिए एक नई इबारत लिखी जाती है, ये इबारत कईयों को डूबा भी सकती है तो डूबते को तेरा भी सकती है, इसे ही अंत मे राजयोग कहते है। यहीं देवली की राजनीति का दस्तूर भी है और एक तरह से ट्रेंड भी है।
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ये ही वह हवा है जिसे भांप ले तो रुख का पता चल जाता है। असल मे आखरी रात के समीकरणों में बदलाव का एक कारण ये भी होता है कि चुनाव प्रचार से मतदाता ये पहचान नही कर पाता कि उसे आखिर किसे वोट करना है। आखिर के दो दिन में जब उम्मीदवार का चुनावी प्रचार चलता है तो सब अपना शक्ति परीक्षण कर ये प्रकट करते है कि वे जीत की कगार पर है लेकिन मतदाताओं की सोच इससे परे होती है। आखिर के दो दिन माइंडसेट के होते है यहीं वह अवधि है, जब मतदाता उम्मीदवारों की सूची में से एक उम्मीदवार के प्रति अपना विश्वास तय करता है। ऐसे कई चुनाव हमने देखे है, जिनमे पहले वह उम्मीदवार जीतता प्रतीत होता है। लेकिन जब रिजल्ट आता है तो सब चोंक जाने पर मजबूर होते है। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि 8 सितंबर की रात भारी रहने वाली है। उम्मीदवार इस अवधि सब कुछ दांव पर लगाने पर मजबूर हो जाता है।
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जातिगत समीकरण साधने की रात
दरअसल आखरी रात जातिगत समीकरणों को साधने की भी रात है। जाति, गोत्र तक इससे अछूते नही रहते। राजनीतिक समझौते भी इसी कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक जाति दूसरे वार्डो में अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए वोटों की सौदेबाजी करती है। ये ऐसी अंक गणित है कि सारे समीकरण धरे रह जाते है। चूंकि ये लोकल चुनाव है लिहाजा छोटी से छोटी बात भी बड़ी संवेदनशील होती है और मतदान को प्रभावित करती है। हालांकि इस रात को शहर की गलियों में रातिजगा होता है और चौकसी भी होती है। प्रशासन की भी नजर रहती है। लेकिन फिर भी असली खिलाड़ी अपना खेल दिखा देता है। अबकी बार नए उम्मीदवार 85 फीसदी है जबकि पुराने धुरंधर बहुत कम है। लेकिन बाहर बैठे धुरंधर एक फूंक में पासा भी पलट सकते है। लिहाजा “नजर हटी और दुर्घटना घटी” की बात यहां साबित हो सकती है।

समझ सकते है वार्डो में हार जीत का अंतर दो डिजिट में होता है। लिहाजा 50 वोट भी इधर से उधर हो जाए तो राजनीतिक परिस्थिति बदल जाती है और पिछले कई चुनावो में ये देखने मे भी आया। हालांकि चुनाव प्रचार खत्म हो चुका है और अब घर- घर जाकर मतदाताओं से सम्पर्क करने की अवधि शुरू हो चुकी है इसलिए अब जो पासे फेंके जाएंगे वे हार जीत को प्रभावित करेंगे।
ग्रामीण सीटों पर असमंजस
नगर पालिका वार्ड परिसीमन के बाद 10 से 11 वार्ड ग्रामीण क्षेत्रों के है, जहाँ की राजनीति सबसे अलग है और शहर के ट्रेंड से अलग भी है। लिहाजा उन सीटों के बारे में कोई धुरंधर शर्तिया तौर पर अनुमान नही लगा सकता। कारण ये है कि ये इलाके पहली बार नगर पालिका में शामिल हुए है। इन्ही सीटों पर भारी घमासान मचा हुआ है। खासकर एससी सीटे तो चकमंगलूर बनी हुई है। उम्मीदवार भी ज्यादा है कई स्थानों पर तो दो-दो ईवीएम मशीन लगानी पड़ेगी। जाहिर है सबसे रोचक मुकाबले यहीं देखने को मिलेंगे। गांवों में भी यहीं रात कत्ल की रात होती है। यहाँ उम्मीदवार अधिक होने से एक दहाई वोट भी समीकरण बदलने के लिए काफी है। शहर की चुनावी हवा से ग्रामीण क्षेत्रों के 10- 11 वार्डों की हवा सबसे इतर है, जिसका अनुसार लगाना कठिन ही नही लगभग नामुमकिन है, सबसे चौकाने वाले रिजल्ट इन्ही सीटों पर आते हुए दिखते है।
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सौदेबाजी की है यह संभावित रात…
प्रशासनिक नजर के बावजूद वोटों को प्रभावित करने, लोभ-प्रलोभन देने की भी ये आखरी रात है। साम, दाम ओर दंड, भेद के तौर तरीकों को आजमाने की भी यही रात है। उम्मीदवार अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए हर सम्भव प्रयास करेंगे। लिहाजा ये रात यदि सही बीत गई तो ठीक नही तो पकी फसलों को चट कर जाने का भी मौका होगा। शराब, वोट ओर नोट तीनो अहम है। देखते है इस महासमर में आखिर कौन बाजी मारता है। कुल मिलाकर लब्बोलुआब ये है कि 8 सितंबर की रात नए समीकरणों के बनने, बिगड़ने की रात है। चौकन्ने रहिए ओर बिना लोभ-प्रलोभन में आए सही उम्मीदवार को चुनने का प्रयास करिए।



