Deoli News 2 अक्टूबर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) धर्मसभा में मुनि वैराग्य सागर महाराज ने कहा कि आहारदान में सभी प्रकार के दान समाहित होते हैं। आहार से प्राणों की रक्षा होती है, जिससे अभयदान भी हो जाता है।
आहार से स्वास्थ्य ठीक रहता है, जिससे औषधि दान का पुण्य भी मिलता है। वहीं आहार ग्रहण कर साधक संयम का पालन करते हैं। इसके लिए शरीर का स्वस्थ रहना आवश्यक है, इसलिए आहारदान में उपकरण दान भी समाहित है। उन्होंने कहा कि पुराणों में भी राजाओं द्वारा जंगलों में मुनियों को आहारदान देने के प्रसंग मिलते हैं। सीता भी वनवास के दौरान भोजन बनाकर अतिथियों की प्रतीक्षा करती थीं और उन्हें भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करती थीं। दान के पात्र उत्तम, मध्यम और जघन्य तीन प्रकार के होते हैं। मुनिराज उत्तम, प्रतिमाधारी मध्यम और असंयमी सम्यग्दृष्टि जघन्य पात्र माने गए हैं। इन पात्रों को दान देने से पुण्य की प्राप्ति होती है। मुनि सुप्रभसागर ने कहा कि आज के व्यक्ति में संतोष का अभाव है, जिसके कारण सुख, शांति और समृद्धि नहीं मिल पा रही है। व्यक्ति स्वयं अशांत है और दूसरों को भी अशांत कर रहा है। संतोष के बिना सुख-शांति और समृद्धि संभव नहीं है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति बाहरी चमक-दमक से आकर्षित होता है, लेकिन अपनी आत्मा की चमक को नजरअंदाज करता है। आत्मा कर्मों की कालिमा से आच्छादित है। आत्मिक शुद्धि के लिए तीर्थंकरों के बताए मार्ग पर चलना आवश्यक है।


