Deoli News 27 अक्टूबर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) महावीर दिगम्बर जैन मंदिर में मुनि सुप्रभ सागर महाराज ने कहा कि आत्मा चार गतियों और चौरासी लाख योनियों में भटकते हुए अनंत काल व्यतीत कर चुकी है। अज्ञानता के कारण मनुष्य भव प्राप्त होने पर भी जीव दुःख भोगता रहा।
आज जिनेन्द्र भगवान की चरण शरण प्राप्त कर जीवन को धन्य बनाने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि जिनेन्द्र भगवान की पूजा स्वर्ग के देव और चक्रवर्ती भी करते हैं। ऐसे भगवान की सेवा और भक्ति पाकर स्वयं को धन्य मानना चाहिए। संसार में कोई स्थाई शरणदाता या आधार नहीं है। मनुष्य भव एक बार छूट जाने पर दोबारा मिलना कठिन है। जिस प्रकार रेत में हीरे का कण गिरने पर उसे ढूंढना मुश्किल होता है, उसी प्रकार दुर्लभ मनुष्य जीवन का सदुपयोग जिनेन्द्र भगवान की भक्ति में करना चाहिए। मुनि वैराग्य सागर महाराज ने कहा कि आज साधन और सुविधाएं सहज उपलब्ध हैं, जबकि पहले शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाइयां होती थीं।

उस समय व्यवहारिक अनुभव अधिक था, लेकिन वर्तमान में शिक्षा सुलभ होने के बावजूद व्यवहारिक अनुभव कम होता जा रहा है। इससे पूर्व संध्या को आचार्य विद्यासागर महाराज के जीवन पर आधारित ‘विद्याधर से विद्यासागर’ नाटिका का मंचन किया गया।
बालब्रह्मचारी चंदन दीदी एवं संध्या दीदी के निर्देशन में माया अजमेरा, रेखा कासलीवाल, वर्षा गोधा और ऋतु कासलीवाल के सहयोग से बच्चों ने आचार्य विद्यासागर महाराज के गृहस्थ जीवन से लेकर संलेखना तक की जीवन यात्रा का मंचन किया।



