150 से अधिक दावेदार, टिकट एक-एक… देवली भाजपा में चुनावी सरगर्मी तेज
Deoli News 22 अगस्त (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) देवली नगर पालिका के 35 वार्डों में पार्षद टिकट के लिए 150 से अधिक दावेदारों का सामने आना भाजपा के लिए सिर्फ मजबूत दावेदारी का संकेत नहीं, बल्कि टिकट वितरण के बाद की चुनौती का भी संकेत है। पार्टी को टिकट वितरण के साथ डैमेज कंट्रोल की भी पॉलिसी बनानी होगी। फिलहाल यह दौर थमा नहीं है, अभी और भी आवेदन आ सकते हैं।
औसतन एक वार्ड में चार से अधिक कार्यकर्ता टिकट की उम्मीद लगाए हुए हैं। जाहिर है, हर वार्ड में टिकट एक ही व्यक्ति को मिलेगा और बाकी दावेदारों को निराशा हाथ लगेगी। ऐसे में भाजपा के लिए असली परीक्षा प्रत्याशी चयन से ज्यादा उस असंतोष को संभालने की होगी, जो टिकट की घोषणा के बाद सामने आ सकता है। लेकिन जनाधार वाले नेता को टिकट देकर पार्टी अपनी साख बचा सकती है।स्थानीय निकाय चुनाव में वार्ड स्तर की राजनीति बेहद व्यक्तिगत होती है। यहां प्रत्याशी की अपनी पकड़, परिवार, रिश्तेदारों, मित्रों और स्थानीय समर्थकों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। इन चुनाव में मतदाता भाजपा कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों को भी नजरअंदाज कर देता है।
निकाय चुनाव में मतदाता की पहली पसंद उनके सुख-दुख में हमेशा साथ खड़ा रहने वाला सेवाभावी नेता होता है। मतदाता यह देखा है कि जिसे वह वोट दे रहा है उसकी राजनीति में आखिर किस हद तक पकड़ है। हर मतदाता यह चाहता है कि उनके वार्ड में कम से कम साफ सफाई बिजली, पानी की व्यवस्था तो सुचारू हो। इसलिए किसी मजबूत दावेदार को टिकट से बाहर करना केवल एक व्यक्ति को नाराज करना नहीं होगा, बल्कि उसके साथ जुड़े समर्थकों के रुख को भी प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि भाजपा को टिकट वितरण के साथ ही डैमेज कंट्रोल की रणनीति पर भी काम करना पड़ेगा। यह भी तय है कि पार्टियों में उंचे लेवल की सिफारिश और बड़े नेताओं से नजदीकी का फायदा भी मिलता है। लेकिन नुकसान पार्टी को सीट को कर उठना पड़ता है।
अव्वल इतनी बड़ी संख्या में दावेदार सामने आने के पीछे कई वजहें दिखाई देती हैं। नगर पालिका चुनाव स्थानीय राजनीति में प्रवेश और अपनी राजनीतिक पहचान बनाने का सबसे सीधा रास्ता माना जाता है। खास बात यह है कि इस बार देवली गांव ग्राम पंचायत भी बड़े तौर पर नगरपालिका में जुड़ चुकी है। इसी तरह बोयडा गांव अंबापुरा भी देवली नगर पालिका के अंग है। कई कार्यकर्ताओं के लिए पार्षद का चुनाव पार्टी संगठन में अपनी सक्रियता साबित करने का अवसर है। वहीं लंबे समय से पार्टी के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं के साथ-साथ नए और महत्वाकांक्षी चेहरे भी इस बार टिकट की दौड़ में शामिल हुए हैं। सोशल मीडिया पर तो अपना प्रचार करने के लिए होड़ सी मच गई है। पार्टी का मजबूत संगठन और भाजपा के टिकट को लेकर कार्यकर्ताओं में दिखाई दे रहा भरोसा भी दावेदारी बढ़ने की एक वजह माना जा सकता है। हालांकि बड़ी संख्या में आवेदन पार्टी के लिए एक सकारात्मक संकेत भी है।
इससे वार्ड स्तर पर भाजपा के पास विकल्पों की कमी नहीं है और पार्टी अलग-अलग सामाजिक समीकरण, सक्रियता, जनसंपर्क तथा जीत की संभावना को देखते हुए उम्मीदवार चुन सकती है। लेकिन विकल्प जितने ज्यादा होंगे, अंतिम फैसला उतना ही संवेदनशील होगा। सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि टिकट नहीं मिलने के बाद बाकी दावेदार पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के साथ कितनी मजबूती से खड़े होते हैं। यदि नाराज दावेदारों को समय रहते समझाया नहीं गया या उन्हें संगठन में सम्मानजनक भूमिका नहीं दी गई, तो चुनाव के दौरान भीतरघात या निष्क्रियता जैसी स्थिति पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है। स्थानीय चुनाव में कई बार अपने ही लोगों की नाराजगी विपक्षी प्रत्याशी की चुनौती से ज्यादा भारी पड़ जाती है।
लिहाजा भाजपा को टिकट चयन के साथ-साथ दावेदारों को साधने की रणनीति भी पहले से तैयार करनी होगी। टिकट से वंचित मजबूत चेहरों को संगठनात्मक जिम्मेदारी, चुनाव अभियान में भूमिका और भविष्य के लिए राजनीतिक आश्वासन देकर साथ बनाए रखना पार्टी के लिए अहम होगा। 35 वार्डों में 150 से अधिक दावेदारों की यह संख्या भाजपा की ताकत भी है और आने वाले दिनों में उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा भी। हालांकि शनिवार को भी टिकट के इच्छुक दावेदार देवली आ रहे विधायक राजेंद्र गुर्जर को भी आवेदन देंगे। जानकारी के अनुसार एक वार्ड से तीन से चार लोगों का पैनल बनाकर आगे भेजा जाएगा।



