Deoli News 3 अक्टूबर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) मुनि सुप्रभसागर महाराज ने प्रवचन के दौरान कहा कि मोह रूपी अंधकार के निवारण और राग-द्वेष से निवृत्ति के लिए ही चारित्र को अंगीकार किया जाता है। मोहनीय कर्म अज्ञानी जीव को ही बंधन में डालता है।

जिन कारणों से क्लेश उत्पन्न होते हैं, मनुष्य को सर्वप्रथम उन्हीं का त्याग करना चाहिए, क्योंकि क्लेश परिणाम ही सांसारिक आवागमन का मूल कारण हैं। आज का मानव अंतहीन भौतिक संग्रह की अंधी दौड़ में शामिल है। संग्रह बढ़ने के साथ-साथ तनाव और अशांति भी बढ़ रही है। इस भौतिकता की होड़ में व्यक्ति अपनों से कटकर एकाकी होता जा रहा है और यही अकेलापन अंततः उसे गहरे तनाव में धकेल देता है। उन्होंने कहा कि वीतराग प्रभु जन्म, मरण और वृद्धावस्था जैसे सभी दोषों से मुक्त हैं, अतः मनुष्य का लक्ष्य भी उसी निर्दोष आत्मिक अवस्था को पाने का होना चाहिए। आज व्यक्ति अपने दोषों को छिपाने का व्यर्थ प्रयास करता है, जबकि वे कभी छिप नहीं सकते।
प्राणी बुढ़ापे से भयभीत होकर नश्वर शरीर के क्षरण को छुपाने के नाना उपाय करता है, लेकिन प्रकृति का यह क्षरण रुकना असंभव है। भगवान ने जन्म-मरण को जीत लिया है, लिहाजा उनका पुनर्जन्म संभव नहीं, क्योंकि जिनका मरण होता है, जन्म भी केवल उन्हीं का होता है।



