राजनीतिक विश्लेषण
@राजेन्द्र बागड़ी, वरिष्ठ पत्रकार
Political News 8 फरवरी ( दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) करीब 27 साल के लंबे वनवास के बाद बीजेपी ने दिल्ली फतह कर ली है। ये राष्ट्रीय राजनीति में बहुत बड़ा संकेत है। नरेन्द्र मोदी यद्दपि तीसरी बार प्रधानमंत्री जरूर बने। लेकिन वे दिल्ली फतह नही कर पाए! इस बार उनके नेतृत्व में न केवल उन्होंने दिल्ली जीती, बल्कि पाँव जमाये बैठी “आम आदमी” को दिवालिया तक बना दिया।
आप पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल, डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया, शिक्षा के मॉडल के रूप में प्रदर्शित सतेंद्र जैन, सोमनाथ भारती, सौरभ भारद्वाज समेत बड़े नेता चुनाव हार गए। इस चुनाव की सबसे बड़ी खासियत ये भी रही कि मुस्लिम मतदाताओं ने पहली बार कांग्रेस, आम आदमी पार्टी को नकार कर मोदी के वायदे पर भरोसा जताया। ये राष्ट्रीय राजनीति में अहम संकेत है, जो आने वाले वक्त में बड़ा बदलाव लाएगा। आम आदमी पार्टी क्यो चुनाव हारी। इस पर बहस होनी चाहिए। लेकिन कुछ बातें जरूर है, जिनसे ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यदि अरविंद केजरीवाल दम्भ , झूंठे वायदे, आरोप लगाओ और भाग जाओ और शराब कांड में जेल में रहने के बावजूद खुद ओर खुद के नेताओ को कट्टर ईमानदारी का सर्टिफिकेट देने और मुख्यमंत्री पद पर रहने के बावजूद जेल जाने जैसे मुद्दे विदाई के कारण बने है।
पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद केजरीवाल ने सरकारी सुविधाओं का बहिष्कार करने की घोषणा की। लेकिन वे ज्यादा समय तक अपने कथन पर कायम नही रह पाए। शराब कांड में जब आप के बड़े नेता लपेटे में आए तो केजरीवाल ने कट्टर ईमानदारी के सर्टिफिकेट बाटने शुरू कर दिए। आंदोलन से निकली पार्टी इस तरह धराशायी हुई है, ये अपने आप मे एक उदारहण बन गया है। समय के साथ केजरीवाल ने अन्ना हजारे की नसीहत के बावजूद न केवल राजनीति दल बनाया, बल्कि सत्ता सुख प्राप्त करने के नकारात्मक चेहरा बन गए। आमआदमी के चेहरे के रूप में मुख्यमंत्री बने केजरीवाल जल्द ही राजनीति की विवादित धारा में पहुँच गए। फिर जो गलतियां उनसे हुई, वे ही उनके पतन का कारण बनी।
यमुना जी को स्वच्छ करने का जो वायदा उन्होंने किया वह झूँठा साबित हुआ। दिल्ली को पेरिस बनाने की उनकी कल्पना ढकोसला साबित हुई। केजरीवाल केवल बीजेपी पर आरोप लगाने, विपक्षी दलों को बेईमान साबित करने, ईवीएम को बदनाम करने, आरोपो की झड़ी लगाकर भाग निकलने जैसे क़ई कारण रहे, जिससे उनकी छवि नकारात्मक बनती गई। बीते 15 बरसो से सत्ता में बने रहने से वे राजनीतिक दम्भ का भी शिकार बनते गए। उन्हें होश में लाने वाला कोई था ही नही। दरअसल केजरीवाल का कोई विजन था ही नही। वे फ्री की रेवड़ियों को जीत का आधार समझ बैठे। शीशमहल पर उनकी पोल खुली। अति महत्वकांशा के चलते क़ई राज्यों में पार्टी का आधार बनाने का जो प्रयास शुरू किया, वह नाकाफी सिद्ध हुआ। राष्ट्रीय राजनीति में उनके प्रवेश करने के चलते उन्हें सभी बड़े दलों के नेताओ को बदनाम करने के बावजूद हाथ मिलाने पर मजबूर होना पड़ा। यही से दिल्ली खिसकने लगी थी। लेकिन वे इसे समझ नही सके। उनकी कथनी और करनी में बड़ा फर्क आने से मतदाताओं में विश्वास खत्म होता गया।
पंजाब में उन्होंने जीतने के लिए खालिस्तान समर्थकों से हाथ मिला लिया। हिन्दू वोटर्स की भावनाओं को छला। राममंदिर को लेकर अनाप शनाप बयानबाजी की। जिसका नतीजा उन्हें हार के रूप में प्राप्त हुआ। केजरीवाल की हार अपने-आप मे स्तब्ध करने वाली है। उनकी हार ने जता दिया है कि वे अपराजेय नही हो सकते। दिल्ली में देश के विभिन्न राज्यों के लोग निवास करते है। ऐसे में ये चुनाव परिणाम एक तरह से भावी राजनीति के लिए बड़ा संकेत है। मुख्यमंत्री आतिशी को छोड़कर कोई बड़ा नेता नही जीत पाना ये साबित करता है कि आमआदमी पार्टी वैचारिक तौर पर दिवालिया हो चुकी थी। मनीष सिसोदिया, सतेंद्र जैन, सौरभ भारद्वाज, सोमनाथ इसलिए हारे कि उन्होंने केजरीवाल की हां में हां मिलाने का काम किया। इसी का नतीजा है दिल्ली की जनता ने उन्हें मुक्त कर दिया। बीजेपी ने विगत नकारात्मक माहौल को भुनाया, मोदी पर पहली बार भरोसा जताया। ये सही है कि बीजेपी के सामने अब बड़ी चुनोती आन पड़ी है। जिसे उसे पूरा करना ही पड़ेगा। आखिर में निष्कर्ष यहीं है कि मतदाताओं को ज्यादा मूर्ख समझना बड़ी गलती होगी। जो ज्यादा नही चलने वाली।
केजरीवाल सदा मतदाताओं को भयभीत करते रहे। मुस्लिम मतदाताओं के मत मिलना बीजेपी के लिए अब तक का सबसे बडी सफलता है। ये संकेत पूरे देश मे जाएगा और इसका व्यापक असर पड़ सकता है। खासकर कांग्रेस, एसपी जैसी पार्टियों को ये वोट बैंक नुकसान कर सकता है।


