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आधुनिक चिकित्सा के साथ पारंपरिक जड़ी-बूटियों पर बल देने की आवश्यकता- डॉ. प्रभुलाल सैनी

राजस्थान में भी एआईआईएमएस खोलने को जरूरी बताया


Deoli News 12 मार्च (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) प्रदेश के पूर्व कृषि मंत्री डॉ. प्रभुलाल सैनी ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं और स्वदेशी जीवनशैली को लेकर कहा कि आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार की सराहना करते हुए हमारी सांस्कृतिक और प्राकृतिक जड़ों की ओर लौटने की आवश्यकता पर बल दिया है। डॉ. सैनी का मानना है कि केवल अस्पतालों का निर्माण ही काफी नहीं है, स्वस्थ समाज के लिए खान-पान और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में सुधार भी अनिवार्य है।

डॉ. सैनी ने आधुनिक चिकित्सा के क्षेत्र में केंद्र सरकार द्वारा देश में तीन नए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान खोलने की बजट घोषणा का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यह कदम देश के चिकित्सा बुनियादी ढांचे को अभूतपूर्व मजबूती देगा, जिससे आम लोगों तक विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ होंगी। लेकिन राजस्थान के संदर्भ में बात करते हुए उन्होंने जोर दिया कि प्रदेश की विशालता और प्राकृतिक संपदा को देखते हुए यहाँ भी स्वास्थ्य सुविधाओं का और अधिक विस्तार होना चाहिए, ताकि राजस्थान स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सके।

उन्होंने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान राजस्थान में भी खोलने पर जोर दिया। प्रदेश की प्राकृतिक संपदा का उल्लेख करते हुए पूर्व कृषि मंत्री ने कहा कि राजस्थान प्रकृति के अनमोल उपहारों का खजाना है। यहाँ करीब 1500 से भी अधिक प्रकार की आयुर्वेद जड़ी-बूटियां और औषधीय पौधे प्राकृतिक रूप से उपजते हैं। वर्तमान में जब पूरी दुनिया पुनः आयुर्वेद की ओर लौट रही है, तब राजस्थान इस क्षेत्र में नेतृत्व कर सकता है। उन्होंने कहा कि यदि किसान आयुष मंत्रालय के मार्गदर्शन में आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा पद्धति की खेती की ओर आकर्षित होते हैं, तो इससे किसानों की आय में वृद्धि के साथ-साथ आम जनता को जटिल रोगों से प्राकृतिक राहत भी मिलेगी।

जीवनशैली में आ रहे बदलावों पर चिंता व्यक्त करते हुए डॉ. सैनी ने कहा कि आज त्वरित भोज्य पदार्थ और डिब्बाबंद भोजन, जैसे पिज्जा और बर्गर का प्रचलन खतरनाक स्तर तक बढ़ गया है। इसका सबसे घातक प्रभाव बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। इन अस्वास्थ्यकर आदतों के कारण नई पीढ़ी में गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ रहा है, जो समाज के लिए एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने अभिभावकों और युवाओं से अपनी थाली में बदलाव करने का आह्वान किया।

श्री अन्न संजीवनी साबित होंगे

बदलते दौर की बीमारियों से लड़ने के लिए डॉ. सैनी ने मोटे अनाज यानी ‘श्री अन्न’ को संजीवनी बताया। उन्होंने स्मरण कराया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2023 को ‘विश्व मिलेट वर्ष’ घोषित किया था। बाजरा, रागी, ज्वार, कोदो और किनवा जैसे अनाज केवल आहार नहीं बल्कि औषधि के समान हैं। ये अनाज पूरी तरह से ‘ग्लूटेन मुक्त’ होते हैं और पोषण से भरपूर होते हैं।

इन्हें दैनिक आहार में शामिल करने से हम न केवल शरीर की आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं, बल्कि भविष्य की पीढ़ी को बीमारियों से सुरक्षित भी रख सकते हैं। डॉ. प्रभुलाल सैनी ने संदेश दिया कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति के साथ-साथ हमें अपनी पारंपरिक जड़ी-बूटियों और मोटे अनाजों की शक्ति को पहचानना होगा।

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