35 वार्डों में बदले समीकरण, कई सीटों पर चौंकाने वाले परिणाम के संकेत
(चुनावी पूर्व अनुमान)
@राजेन्द्र बागड़ी
Desk News 10 सितम्बर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क)। कहते हैं, सौ सगुन को एक काल खा जाता है तो जातियों का गठबंधन और गोत्रों का गठजोड़ चुनाव परिणामों को प्रभावित करता ही है। यही निर्विवाद सत्य है। देवली के इस चुनाव में भी कुछ ऐसे ही समीकरण देखने को मिले हैं। शहर के 35 वार्डों में कमोबेश यही स्थिति रही। इसका परिणाम यह रहा कि आखिरी रात तक उम्मीदवारों के समीकरण लटके भी और भटके भी।
शहर की कुछ सीटों पर परिणामों को लेकर तस्वीर काफी हद तक स्पष्ट नजर आ रही है, लेकिन पूरी तस्वीर अभी साफ नहीं है। असली तस्वीर 14 सितंबर को मतगणना के बाद ही सामने आएगी और वही अंतिम तस्वीर होगी। फिर भी कुछ निजी स्रोतों, पार्टियों के जानकारों, फील्ड की परख, उम्मीदवारों की चुनावी गतिविधियों और जमीनी माहौल जैसे विभिन्न तथ्यों के आधार पर हवा का रुख भांपने का प्रयास किया गया। इसके आधार पर जो निष्कर्ष सामने आया है, उसमें देवली में बड़े पैमाने पर फेरबदल के संकेत दिखाई दे रहे हैं। कुछ सीटें जीतते-जीतते हार के कगार पर पहुंच गई हैं तो कुछ हारते-हारते जीत की दहलीज पर पहुंचती नजर आ रही हैं। कुल मिलाकर 35 वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक आने का अनुमान है, जो निश्चित रूप से चौंकाने वाला परिणाम हो सकता है। जातियों के गठजोड़ का असर कई वार्डों तक दिखाई दिया है। अनुमान है कि निर्दलीयों की संख्या 10 से 12 या अधिक भी पहुंच सकती है।
टिकट वितरण में दोनों प्रमुख दलों से भी कुछ बड़ी चूकें हुईं। कई जगह जिताऊ उम्मीदवारों की उपेक्षा पर व्यक्तिगत स्वार्थ भारी पड़ता नजर आया। वहीं परिसीमन भी कई जगह असमानता का कारण बना। कुछ वार्ड बहुत बड़े तो कुछ अपेक्षाकृत छोटे हो गए। इस असमानता ने जातीय समीकरणों और स्थानीय गठजोड़ को भी प्रभावित किया और कई सीटें इसकी राजनीति की शिकार होती दिखाई दीं। दो बड़े प्रभावशाली वर्गों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की स्थिति भी बनी। वर्चस्व की इस लड़ाई में सभी को नुकसान हुआ। किसी दल को कम तो किसी को ज्यादा नुकसान होने का अनुमान है।
दोनों प्रमुख दलों ने कई दलबदलुओं को भी टिकट दिए। ऐसे उम्मीदवारों में कुछ सीटों पर स्थिति मजबूत नजर आ रही है, लेकिन कई जगह उन्हें अपेक्षित जनसमर्थन मिलता दिखाई नहीं दे रहा। वहीं कुछ वार्डों में ऐसे उम्मीदवार भी मैदान में रहे, जिन्हें अपेक्षाकृत कमजोर माना जा रहा है। इसका सीधा फायदा निर्दलीय उम्मीदवारों को मिलने की संभावना बढ़ी है। निर्दलीयों की संख्या बढ़ने की संभावना का एक कारण यह भी है कि कुछ वार्डों में चुनावी मुकाबला सीधे दो प्रमुख दलों के बीच न होकर त्रिकोणीय या बहुकोणीय हो गया। ऐसे में आम मतदाताओं का रुझान निर्णायक भूमिका निभा सकता है। राजनीतिक हवा का रुख, उम्मीदवार की कार्यप्रणाली, चुनाव लड़ने की शैली, पिछला ट्रैक रिकॉर्ड और फील्ड रिपोर्ट के आधार पर कुछ सीटों पर जीत की संभावना अपेक्षाकृत स्पष्ट दिखाई दे रही है। इनमें पूर्व पालिका अध्यक्ष नेमीचंद जैन, ललित तेजी, गोपाल टेलर, सौरभ जिंदल, रामनिवास मीणा, भीमराज जैन की सीटें शामिल हैं। वहीं कुछ सीटें कड़े संघर्ष में फंसी हुई हैं। जिनका फैसला मतगणना के बाद ही होगा। करीब आधा दर्जन सीटों पर बहुकोणीय मुकाबला है। लगभग 4 से 5 सीटों पर राजनीतिक समीकरणों में बदलाव के संकेत हैं, इसलिए यहां परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं।

ग्रामीण क्षेत्र से जुड़ी 10 से 11 सीटों में भी ज्यादातर रुझान निर्दलीय उम्मीदवारों के पक्ष में जाता दिखाई दे रहा है। इन सीटों पर चुनाव परिणाम अनपेक्षित हो सकते हैं और यहां भी बड़े उलटफेर की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यह जानकारी अंतिम परिणाम नहीं है, बल्कि चुनावी रुझानों और जमीनी समीकरणों के आधार पर लगाया गया अनुमान है। इसलिए केवल उन्हीं सीटों और उम्मीदवारों का उल्लेख किया गया है, जिनकी स्थिति जमीनी स्तर पर अपेक्षाकृत स्पष्ट महसूस हुई। जिन सीटों पर लेकिन, किंतु और परंतु जैसी स्थिति बनी हुई है, उन्हें संघर्ष की स्थिति में रखा गया है। निर्दलीयों की संख्या का अनुमान भी उन वार्डों को ध्यान में रखकर लगाया गया है, जहां दोनों प्रमुख दलों के बीच सीधी टक्कर के बजाय त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबला दिखाई दिया। साथ ही आम मतदाताओं के रुझान को भी इसमें आधार बनाया गया है।
लिहाजा इसे अंतिम परिणाम नहीं माना जाना चाहिए। हमारी गणना और समझ में गलती की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, जोखिम उठाते हुए जमीनी स्तर पर महसूस किए गए कुछ तथ्यों और चुनावी समीकरणों के आधार पर यह पूर्वानुमान प्रस्तुत किया गया है। इन अनुमानों की असली परीक्षा 14 सितंबर को सामने आने वाले चुनाव परिणामों से होगी।


