Deoli News 10 सितंबर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) सोलह कारण भावना की महत्ता बताते हुए मुनि वैराग्य सागर महाराज ने कहा कि पंचम काल में अरिहंत परमेष्ठी के अभाव में धर्म का उपदेश जिनवाणी से प्राप्त होता है।
जिनवाणी की विनय एवं भक्ति करना ही प्रवचन भक्ति भावना है। उन्होंने कहा कि जहां विज्ञान रुकता है, वहां वीतराग का ज्ञान आगे बढ़ता है। जैनागम में जिन विषयों का वर्णन हजारों वर्ष पहले किया गया, विज्ञान आज भी उनमें से बहुत कुछ खोज नहीं पाया है। सभा में मुनि ने अष्ट मंगल द्रव्यों की महत्ता बताते हुए कहा कि ध्वजा विजय और उत्साह का प्रतीक है। भगवान ने कर्मों पर विजय प्राप्त की, इसलिए धर्मध्वजा धारण करना पुण्य का कार्य है। कार्यक्रम में श्वेता जैन कोटा एवं राजकुमार कोठारी ने मंगलाचरण, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन व शास्त्रदान किया।
पाद प्रक्षालन श्वेता हिमांशु जनेश जैन कोटा ने किया। ट्रस्ट के शांति लाल जैन ने दशलक्षण पर्व पर आयोजित श्रावक संस्कार शिविर में लोगों से भाग लेने की बात कही।
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