Tuesday, October 13, 2026
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HomeDainik Bureau Deskमोह में भटक रहा जीव, आत्मतत्त्व भीतर ही विद्यमान: मुनि वैराग्य सागर

मोह में भटक रहा जीव, आत्मतत्त्व भीतर ही विद्यमान: मुनि वैराग्य सागर


Deoli News 13 अक्टूबर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) महावीर दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि सुप्रभसागर महाराज ने कहा कि जिनेन्द्र भगवान के अभिषेक जल को श्रद्धापूर्वक मस्तक एवं नेत्रों पर धारण करने से लौकिक और परालौकिक संपदा की प्राप्ति होती है।

उन्होंने कहा कि भगवान के अभिषेक जल को आदरपूर्वक धारण करने वाला व्यक्ति पुण्य अर्जित करता है। मुनि वैराग्य सागर महाराज ने कहा कि व्यक्ति आहार, भय, मैथुन और परिग्रह में उलझकर अपने आत्मतत्त्व को भूल जाता है। जिस प्रकार शराबी अपने घर के बाहर खड़े होकर भी घर को ढूंढता है, उसी प्रकार मोह में डूबा जीव अपनी आत्मा को इधर-उधर खोजता रहता है, जबकि आत्मतत्त्व उसके भीतर ही विद्यमान है। मुनि सुप्रभसागर महाराज ने कहा कि भगवान की भक्ति करते समय श्रद्धालुओं के मन में बार-बार पुण्य अवसर प्राप्त होने की भावना होनी चाहिए। अभिषेक और पूजा-अर्चना के माध्यम से व्यक्ति अपनी धार्मिक आस्था को प्रकट करता है।

मुनि वैराग्य सागर महाराज ने कहा कि आत्मकल्याण के लिए मोह-माया से दूर रहकर आत्मचिंतन करना आवश्यक है। जब व्यक्ति अपने भीतर विद्यमान आत्मतत्त्व को पहचान लेता है, तभी वह सही मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।

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