अल्पसंख्यक उम्मीदवार भी मैदान में, विधानसभा चुनाव- 2023
राजेन्द्र बागड़ी, वरिष्ठ पत्रकार
Deoli News 1 नवम्बर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) राजनीति व शेयर के भाव परिस्थितियों के मुताबिक घटते-बढ़ते है। हाल में कांग्रेस के दिग्गज नेता सचिन पायलट के वैवाहिक जीवन के बारे में हुए खुलासे के बाद ये विषय विचारणीय हो गया है। सवाल ये है कि क्या पायलट इस हालात से फायदे में रहेंगे या उन्हें इसका नुकसान संभव है। हालांकि ये विषय मानवीय दृष्टिकोण से बेहद सवेदनशील है।
लेकिन इस पर पहली बार चर्चा भी इसलिए हुई कि पायलट की वैवाहिक जिंदगी अति गोपनीय और रहस्यमय बनी हुई थी। पायलट जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला के दामाद रहे है। कहानी इसलिए भी रहस्यमय रही कि सार्वजनिक जीवन मे पायलट के साथ उनकी पत्नी वर्ष 2018 के दौरान सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में आखरी बार देखी गई थी, उसके बाद कभी उनकी पत्नी सार्वजनिक तौर पर नही दिखी। यद्दपि ये विषय पायलट के निजी जीवन का है। लेकिन ये ही सवाल उनकी राजनीतिक जीवन के लिए भी अहम है।
कहा जाता है फारुख अब्दुल्ला की बेटी सारा और पायलट की शादी को अब्दुल्ला परिवार ने काफी समय तक मंजूर नही किया था और बाद में मंजूर किया तो ये रिश्ता ज्यादा नही चला और उनके बीच तलाक हो गया। पायलट और सारा के रिश्ते से अल्पसंख्यक समुदाय से एक रिश्ता भी बना तो उसका राजनीतिक समीकरण भी बना और उसका पायलट को फायदा भी मिला। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में जब पायलट टोंक से चुनावी मैदान में उतरे तो टोंक में उन्हें अल्पसंख्यक मतदाताओं का जबरदस्त समर्थन मिला और वे बीजेपी के अल्पसंख्यक समुदाय से पहली बार उतारे गए युनुस खान अल्पसंख्यक समुदाय के वोटों की खासी तादाद के बावजूद करीब 55 हजार मतों से हार गए।
वर्ष 2018 के चुनावी विश्लेषण में ये साफ हुआ कि उनकी पत्नी सारा अब्दुल्ला के अल्पसंख्यक होने से व फारुख अब्दुल्ला के टोंक में पुराने रिश्तों की वजह से मतदाताओं से उन्हें भारी समर्थन मिला। वहीं हिन्दू वोट भी उन्हें मिले। अब चूंकि पायलट ने नामांकन के दौरान रिटर्निंग ऑफिसर को दिए एफिडेविट में स्वीकार कर लिया है कि उनका सारा अब्दुल्ला से तलाक हो चुका है तो ये विषय नए सिरे से समीक्षा का हो जाता है। पायलट दुबारा टोंक से विधानसभा का चुनाव लड़ रहे है। टोंक का इतिहास भी यही रहा है कि वहां कोई उम्मीदवार दुबारा नही जीते। तलाक के बाद क्या टोंक में अल्पसंख्यक मतदाताओं की मानसिकता में बदलाव आएगा या वहीं बना रहेगा, ये बहस का विषय तो बन ही गया है। असुदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमइएम की और से टोंक में प्रत्याशी शोयब खान व आम आदमी पार्टी से मुन्ना केसरी के तौर पर अल्पसंख्यक उम्मीदवार उतारने के बाद ये तो तय है कि पायलट के लिए पिछले चुनाव जैसे आरामदायक हालात तो नही होंगे।
देवली-उनियारा से विजय बैंसला के बीजेपी से उतरने के बाद गुर्जर मतों को कुछ फीसदी भटकने का खतरा तो बना ही रहेगा!


