बीजेपी को और मिला निर्दलीयों का साथ
@राजेन्द्र बागड़ी
Deoli News 15 सितम्बर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) बहुमत हासिल कर चुकी भाजपा में अध्यक्ष के चयन को लेकर गम्भीर मंथन चल रहा है, विषय ये है कि अनुसूचित जाति आरक्षित नगरपालिका अध्यक्ष की सीट के लिए पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी कौन हो?बीजेपी की महिला प्रत्याशी चेयरमैन बने या पुरूष प्रत्याशी को टिकट थमाया जाए।
चर्चा जोरों पर है कि पार्टी सिंबल पर जीते पार्षद को चेयरमैन का टिकट दिया जाए, इस बात में दम भी प्रतीत होता है। खास और गौर लायक बात ये है कि भाजपा के पास आवश्यकता से अधिक निर्दलीयों की संख्या हो गई है। ऐसे में संकेत है कि बीजेपी हाईकमान और विधायक दोनों प्रत्याशी का चयन आज रात तक कर लेंगे। सूत्रों के मुताबिक बीजेपी पार्षदों की बहुतायत संख्या के चलते राजनीति की दिशा को बदल सकती है। ज्यादातर संकेत महिला उम्मीदवार के चयन को लेकर है। यदि ऐसा हुआ तो शहर में राजनीति की धुरी बदल जाएगी। बीती रात निर्दलीय तौर पर जीते मुकेश महावर के अचानक भाजपा जॉइन करने के बाद निर्दलीयों के मिजाज डाउन लेवल पर आ गए।
बीती रात भाजपा ने 18 का आंकड़ा प्राप्त ही नही किया, बल्कि कई निर्दलीयों को भी साथ ले लिया। इससे भाजपा हद से ज्यादा मजबूत हुई है। दूसरी और कांग्रेस की समस्या सबसे बड़ी ये है कि अनुसूचित जाति आरक्षित सीटों से उनका एक भी प्रत्याशी नही जीता। अब कांग्रेस के पास “उधार का सिंदूर” भरने के अलावा कोई चारा नही बचा। उल्लेखनीय है अनुसूचित वर्ग के 8 उम्मीदवार जीते है जिनमें भाजपा के तीन और निर्दलीय 5 है, जबकि कांग्रेस के कोटे में एक भी नही है। कुल मिलाकर बनी राजनीतिक स्थितियों में कांग्रेस के पास न तो लड़ने के लायक सामान बचा है और न उम्मीदवार है। ऐसे में अध्यक्ष का चुनाव पूरी तरह नीरस हो गया है। कांग्रेस को अनुसूचित जाति का निर्दलीय प्रत्याशी खोजना पड़ रहा है। जबकि भाजपा के पास निर्दलीयों की कतार है। पहली बार भाजपा को मिले बहुमत से उन “धुरंधरों” के होश फाख्ता है, जो कई दशकों से शहर के बेताज बादशाह कहलाना पसंद करते थे। विधायक गुर्जर के पास जो संख्या है वह सभी को निसहाय बना रही है। न कांग्रेस मुकाबला करने की स्थिति में है और न ही पासा बदलकर किंगमेकर बनने वाले लोगो के लिए मौका है। ऐसे में लग रहा है कि होगा वहीं जो विधायक गुर्जर या पार्टी पदाधिकारी चाहेंगे। सूत्र तो इतना संकेत कर रहे है कि बीजेपी अपने टिकट पर जीते उम्मीदवार को ही मैदान में उतारेगी।
वह चाहे पुरूष हो या महिला हो। ये बात इसलिए भी जम रही है कि पालिका उपाध्यक्ष के चुनाव में किसी जनरल उम्मीदवार को उतारकर नियंत्रण की स्थिति बनाने का विकल्प खुला रखेगी। भाजपा में सब जाति वर्ग के पार्षद जीते है। लिहाजा भाजपा के समक्ष सब विकल्प खुले है। कांग्रेस इस बार भारी हताशा के दौर से उबर नही पा रही है। जाहिर है वाइस चेयरमैन भी भाजपा का ही बनता दिख रहा है। बहरहाल सौ बातों की एक बात है कि भाजपा बाहुबली बनकर उभरी है और कांग्रेस की हालत इस बार ज्यादा पतली है। सांसद की राजनीतिक प्रतिष्ठा को जितना धक्का लगा है, उतना कभी महसूस नही किया गया।
जबकि विधायक राजेंद्र गुर्जर की राजनीतिक छवि को जबरदस्त उठाव मिला है। जातिगत आधार पर भाजपा में सर्वाधिक 5 जैन समाज के 2 जाट, 3 तेली समाज के, टेलर, वाल्मिकी, राजपूत, एक ब्राह्मण, एक धाकड समाज से समेत 3 अनुसूचित जाति के उम्मीदवार जीते है।


