Deoli News 5 अप्रैल (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) जब तक जीव का मोहनी कर्म चक्र नही टूटेगा, तब तक उसे मुक्ति का मोक्षफल नही मिलेगा। पंचम काल में भी मनुष्य भगवान के दर्शन कर अन्तःकरण से भक्ति भाव करता है तो संयम दर्शन पाकर जीव मुक्ति का मार्ग प्राप्त कर सकता है।

यह प्रवचन पंचकल्याणक अंतर्गत केवल ज्ञान समोशरण रचना के दौरान मुनि सुप्रभ सागर ने धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि श्रावकों को जीवन मे आठ मूल गुणों का पालन करना चाहिए। सभा में पूछे गए सवाल पर कहा कि तीर्थंकरों की वाणी में पद आया था। लेकिन लोगों ने उसे पंथ से जोड़कर समाज को विखंडित कर दिया है। जीवन चक्र को समाप्त करने के लिए मोहनी कर्म को तोड़ना होगा। आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी ने कहा कि भावना से पाप पुण्य दोनों बनते है जो कुछ होगा भावना से होगा।
मुनि वैराग्य सागर महाराज ने कहा कि तप बड़ा है, जिसका अर्थ भीड़ से अकेला होना है, ताकि राग द्वेष, मद मोह, माया जैसे विकारों का त्याग हो सके। इससे पूर्व शुक्रवार रात पंचकल्याणक में तीर्थंकर बालक पारस कुमार का आनंदोत्सव, बालक को पालना व बाल क्रीड़ा की सजीव कार्यक्रम हुए।
जबकि शनिवार को तप व ज्ञान कल्याणक मनाया गया। जिसमे प्रातः जाप्यानुष्ठान, आराधना, अभिषेक व शांतिधारा के बाद जन्म कल्याणक पूजन, हवन, कमठ द्वारा उपसर्ग एवं यक्ष का दिव्य देशना, लौकांतिक देवों द्वारा स्वटन, दीक्षा विधि, अंकन्यास संस्कार रोपण, तिलकदान एवं अन्य क्रियाएं प्राण प्रतिष्ठा, दिव्य देशना, आहारचर्या (पारस कुमार)हुई। दोपहर में मंगलकारक जाप, आराधना, अधिवासना, सूर्य मंत्र, केवलज्ञान समोशरण रचना, मुनिराज की देशना हुई। शाम को आरती व शास्त्र प्रवचन हुए।



