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बनास माँ की गोद मे क्यू हो रहा है ये सब!
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सामाजिक संगठनों को करनी होगी पहल तभी ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है!
@राजेन्द्र बागड़ी, वरिष्ठ पत्रकार
Deoli News 5 नवम्बर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) हल्की फुल्की बात का तनाव, डिप्रेशन, परिजनों की बात को गहरे में ले जाने का दौर इस वक्त चल रहा है, ये समाज और परिवारों के घातक बनता जा रहा है। अगर इस संकेत को नही समझा गया तो परिवार “मौत का नेग” देते रहेंगे।
बीसलपुर डेम के निर्माण के बाद नेगडिया ब्रिज पर लगभग 60 से 70 फीट जल का भराव रहता है। यह स्थान आबादी क्षेत्र से दूर भी है और सुनसान भी है।
काफी अरसे से ये स्थान ” नकारात्मक ऊर्जा” उत्सर्जित कर रहा है। बीते तीन वर्षों के मोटे आंकड़े देखे तो अब तक लगभग 2 दर्जन हादसे इसी “नकारात्मक” स्थिति के कारण घटित हुए है। वर्तमान में कुछ बरसो से युवक, किशोर ज्यादा तनावग्रस्त दिखाई देते है, ये डिप्रेशन की हालत अचानक नही होती, इनकी हालत में बहुत समय पहले बदलाव दिखाई देने लगता है।
लेकिन परिजन उसे पहचान नही पाते और जब विस्फोट होता है तो उसके बीच सेंकडो ऐसे कारण निकलकर सामने आते है, जिनका यदि वक्त पर निराकरण हो जाता तो सम्भवतः ये हालात उपस्थित नही होते। खासकर ये हालात युवाओं, किशोरों में है। व्यक्तिगत अपेक्षाएं इतनी बढ़ गई है कि उनकी पूर्ति करना संभव नही दिखता। लव अफेयर्स, बेरोजगारी, पढ़ाई, धन की कमी, बेशुमार इच्छाओं की पूर्ति नही होना सहित कई कारण है, जिनसे ये अवसाद का खेल पनप रहा है।
परिवारों को सचेत होना होगा
डिप्रेशन, अवसाद एक मनोरोग है, जो मन के विचारों से सृजित होता है। कल्पनाओं के संसार मे जीने वाले युवाओं, किशोरों को वास्तविक यथार्थ से रूबरू करवाने के लिए परिवार के लोगों को आगे आने की जरूरत है। सबसे पहले परिजनों को ही पहल करनी होगी क्योंकि हादसे के बाद सबसे अपूरणीय क्षति परिजनों को ही भुगतनी होती है।
व्यस्तता के दौर में परिजनों या मुखिया को अपनी नजर ओर अनुभव का विस्तृत करना होगा। परिवार की किशोरिया, महिलाएं, छोटे समझदार बालक इस सिस्टम की मजबूत कड़ी बन सकते है। उनकी सूचनाएं महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि ये सिस्टम हर घर मे मजबूत हो जाए तो फिर डिप्रेशन वाले शक्श का पता लगाया जा सकता है। वर्तमान की जीवनशैली, मोबाइल चैटिंग, रील बनाना जैसे दौर एकांकीपन बढ़ा रहे है। इन सब स्थितियों पर नजर रखने की जरूरत है।
परिवारों में धार्मिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की जरुरत
वर्तमान में तनाव को कम करने का महत्वपूर्ण कारक है, अपनी संस्कृति, धार्मिक मूल्यों से दूर होना। आधयात्मिक सोच परिवार को सकारात्मक दृष्टि की और ले जाती है। व्यस्तता के दौर में रात्रि को परिवार का एकत्रित होना और बोझिल वातावरण को बदलने में न केवल मदद कर सकता है, बल्कि परिवार के सदस्यों की मनोभावनाओं को समझने का अवसर भी प्राप्त हो सकता है।
एकांकीपन ही सबसे बड़ा कारण है, जो डिप्रेशन को बढ़ाता है। धार्मिक गतिविधियों से परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। हफ्ते में दो घण्टे का समय इसी विषय पर हो तो सोच में बदलाव हो सकता है। सत्संग, कीर्तन, सामुहिक पाठ, पठन आदि हो सकते है, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है।
निराशा ही ” डिप्रेशन” की जड़ है
सोच बदले, निराशा मन को नकारात्मक विचारों से भरती है। यथार्थ में जीने की कला धार्मिक विचारों से आती है। यदि कोई परिजन एकांकी रह रहा है, उदास है, निराश है तो सहारा दे… उनको हल्का करने के लिए उनकी बात ठंडे, शांत मन से सुने और ऐसे शख्स को भरोसा दिलाए कि वे उनके साथ हैं। ऐसे लोगो को भावात्मक सम्बन्धों की गहन जरूरत होती है।
नेगडिया पर मोटिवेशनल व इमोशनल बोर्ड लगे
आत्महत्या शास्त्रों में घोर अपराध है। सामाजिक संगठनों को ये पहल करनी चाहिए। नेगडिया ब्रिज से एक किमी तक ऐसे मोटिवेशनल व इमोशनल बोर्ड लगने चाहिए जो नकारात्मक विचारों पर बेन लगा दे। ऐसे इमोशनल फोटो भी हो सकते है, जो अपने फैसले पर पुनर्विचार करने पर मजबूर कर दे। यह बोर्ड जैसे कि, घर पर मां-बाप इंतजार कर रहे हैं, मरने के बाद बच्चों और पत्नी का क्या होगा, क्या आत्महत्या से सब समाधान संभव, आत्महत्या महापाप आदि हो सकते है। ये प्रयास सरकार, प्रशासन नही कर सकता। लेकिन सामाजिक संगठन ऐसा बीड़ा उठा सकते है। बनास नदी में सबसे ज्यादा आत्महत्या के मामले नेगडिया ब्रिज पर हुए है ऐसी हालत देवली से इस रोड पर ऐसे मोटिवेशनल, इमोशनल बोर्ड, पोस्टर लगने चाहिए, जिससे यदि एक भी शक्स वापस लौट आता है तो यही बड़ी उपलब्धि होगी। प्रशासन से ये उम्मीद इसलिए बेमानी है कि सरकार के कई नियम होते है कायदे होते है।
सरकार से उम्मीद करें कि वह नेगडिया ब्रिज पर चौकी खोल दे तो ये भी संभव नही। आखिर पुलिस और प्रशासन कहां तक ध्यान रखेगा। हमारा सुझाव है कि ब्रिज पर दोनों और ऊंची जालियां लगनी चाहिए, जैसे रेलवे ओवरब्रिज पर लगती है तो भी हादसों को रोका जा सकता है। ये काम प्रशासन अतिरिक्त बजट के जरिए करवा सकता है। नजीर ये भी है कि कोटा के ” हैंगिंग ब्रिज” भी ऐसा है।
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