देवली अस्पताल में परेशान रहे मरीज और डॉक्टर बटोरते रहे छुट्टियां
@राजेंद्र बागड़ी
Desk News 23 नवंबर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) चिकित्सक को समाज में ‘भगवान’ का दर्जा दिया गया है और अस्पताल को उम्मीद का आखिरी घर, लेकिन देवली के राजकीय उप जिला चिकित्सालय में मंगलवार को जो व्यवस्था दिखी उसने इन दोनों ही धारणाओं को झकझोर कर रख दिया।
साल खत्म होने को है, लिहाजा अपनी बची-कुची सरकारी छुट्टियां ‘कैश’ करने की अंधी दौड़ में यहां के डॉक्टरों ने उन मरीजों के दर्द को ही भुला दिया, जिनकी सांसों की डोर उनके हाथों में होती है। मंगलवार सुबह अस्पताल के गलियारों में केवल मायूसी पसरी थी। दूर-दराज के गांवों से, कड़कड़ाती ठंड में अपना काम छोड़ कर आए कई मरीज जब डॉक्टर के कमरे तक पहुंचे, तो वहां इलाज के बजाय ‘अनुपस्थित’ लिखे सूचना पट ने उनका स्वागत किया। अस्पताल में नियुक्त कुल 19 डॉक्टरों में से 11 डॉक्टर गायब थे। इनमें से 10 डॉक्टर सुबह की ड्यूटी पर नहीं आए, जबकि एक की ड्यूटी शाम को थी।
आलम यह था कि फिजिशियन, ऑर्थोपेडिक, शिशु रोग और स्त्री रोग जैसे अति-आवश्यक विभागों के कमरों में डॉक्टर नहीं थे। मरीज और उनके परिजन बेबस होकर इधर-उधर भटकते रहे। हालांकि जो डॉक्टर यहां मौजूद थे, उन्हीं से रोगियों को उपचार लेना पड़ा। लिहाजा इंतजार भी लाजमी था।
छुट्टियों का लालच और नैतिकता की हार
इस बदहाली की वजह किसी आपातकालीन स्थिति का होना नहीं, बल्कि डॉक्टरों का अपना व्यक्तिगत स्वार्थ था। नियमानुसार चिकित्सकों को साल में 15 आकस्मिक अवकाश मिलते हैं, जो 31 दिसंबर तक उपयोग न करने पर स्वतः समाप्त हो जाते हैं। विडंबना देखिए कि जीवन बचाने का संकल्प लेने वाले इन ‘रक्षकों’ ने अपने अवकाश को बचाने के लिए अलग-अलग सामूहिक रूप से छुट्टी ले ली। चौंकाने वाली बात यह है कि व्यवस्था की कमान संभालने वाले प्रभारी चिकित्सक ने भी अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय इस ‘छुट्टी की होड़’ में शामिल होना बेहतर समझा।
चर्चा यह भी रही कि इनमें से कई डॉक्टरों के निजी क्लीनिक देवली में चल रहे हैं। जबकि यह काम सरकारी ड्यूटी के बाद भी हो सकता था। यदि उन्होंने एनपीए नहीं लिया हो तो उन्हें निजी प्रैक्टिस से कोई खतरा नहीं है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी तनख्वाह और सुविधाओं का लाभ लेने वाले इन चिकित्सकों के लिए आम गरीब मरीज की जान की कोई कीमत नहीं है? क्या मानवता की सेवा का शपथ पत्र केवल कागजों तक सीमित रह गया है? यदि डॉक्टर चाहते तो बारी-बारी से अवकाश लेकर अपनी छुट्टियां भी बचा सकते थे और अस्पताल की व्यवस्था को भी चालू रख सकते थे, व्यस्त व एक रूटीन की बोरियत भरी जिंदगी से छुट्टी का सुखद एहसास डॉक्टर के लिए भी जरूरी है। आखिर उनका भी परिवार है औऱ उनकी भी खुशी है, वे भी इंसान हैं। उन्हें भी अवकाश लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, ताकि वह भी अपना जीवन अच्छे से व्यतीत कर सके। लेकिन मानवता और जिम्मेदारी को छोड़कर यह करना डॉक्टरी पेशे के खिलाफ है। लेकिन उन्होंने एक साथ गायब होकर पूरे अस्पताल को ही ‘बीमार’ बना दिया। यदि इन डॉक्टर में से दो-तीन डॉक्टर भी दिसंबर माह में अलग-अलग अवकाश लेते तो यह विकराल समस्या नहीं होती और उन्हें जिंदगी जीने का भी पूरा मौका मिलता। सरकारी अस्पताल एक पब्लिक पैलेस है, जहां दिन भर में हजारों लोग आते हैं। छोटी मोटी कमी को नजरअंदाज किया जा सकता है। हर बार आमजन, जनप्रतिनिधि और मीडिया इसे नजरअंदाज भी करते हैं। लेकिन नजरअंदाज करने की भी लिमिट होती है। एक साथ करीब एक दर्जन डॉक्टर नहीं होना गंभीर विषय है।
जवाबदेही से बचते जिम्मेदार
जब इस संवेदनहीनता के बारे में उपखंड अधिकारी देवली से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने फोन रिसीव करना भी मुनासिब नहीं समझा। वहीं मुख्य चिकित्सा अधिकारी टोंक ने मामले से अनभिज्ञता जताते हुए कहा कि उनसे कोई छुट्टी नहीं ली गई है और वे मामले को दिखवाएंगे। अब सवाल यह है कि बिना उच्चाधिकारियों की अनुमति के इतना बड़ा स्टाफ एक साथ नदारद कैसे हो गया?
फिलहाल, सोशल मीडिया पर वायरल होती डॉक्टरों की अनुपस्थिति पट्टिका की फोटो ने आम जनमानस में आक्रोश भर दिया है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या इन लापरवाह जीवन रक्षकों पर कोई कड़ी कार्रवाई होगी, या फिर सिस्टम की यह ‘बीमारी’ ऐसे ही मरीजों की जान से खेलती रहेगी?



