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अंता में बीजेपी के हार के कई मायने!!!
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ये सरकार की हार या राजे की?
@राजेन्द्र बागड़ी, वरिष्ठ पत्रकार
Desk News 14 नवंबर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) अंता का उपचुनाव बीजेपी नही जीत पाई, अबकी बार उन्ही नरेश मीणा ने कांग्रेस की नही बीजेपी की लुटिया डुबाई। पहले कांग्रेस ने नरेश को बीजेपी की बी टीम का दर्जा दिया था। लेकिन अब कांग्रेस जीत गई है तो अब नरेश के बारे में क्या कहेगी? ये सवाल खड़ा रहेगा बहरहाल कांग्रेस की जीत को बीजेपी कैसे लेती है, ये दिलचस्प होगा। इस चुनाव की खास बात ये रही कि समूचा चुनाव सरकार या संगठन ने लड़ा या पूर्व मुख्यमंत्री राजे की टीम ने लड़ा, इस पर भी बहस होगी।
अव्वल तो कांग्रेस ने उपचुनाव की घोषणा के साथ ही प्रमोद भाया को उम्मीदवार घोषित कर बढ़त बनाई तो साथ ही निर्दलीय नरेश मीणा ने भी अंता से चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। लेकिन बीजेपी ने अपना उम्मीदवार घोषित करने में काफी देर की। वजह साफ थी पार्टी संगठन राजे की नाराजगी मोल नही लेना चाहती थी इसलिए ये देरी हुई। अंता वसुंधरा राजे का इलाका था और उनके पुत्र दुष्यंत सिंह का लोकसभा क्षेत्र था। लिहाजा राजे पर उम्मीदवार का भार छोड़ा गया। नतीजन राजे ने जिताऊ कैंडिडेट ढूंढने के बजाय स्थानीय उम्मीदवार मोरपाल सुमन को चुना।
शायद राजे की रणनीति स्थानीय कैंडिडेट की रही लेकिन ये दावा काम नही आया। कांग्रेस के भाया ने करीब 69 हजार वोट लेकर जीत हासिल कर ली। जबकि बीजेपी के मोरपाल सुमन ओर निर्दलीय नरेश ने लगभग 50-50 हजार से ऊपर वोट लिए। भले ही 128 वोट ज्यादा वोट लेकर बीजेपी दूसरे स्थान पर आ गई। लेकिन ये कोई सम्मान वाली स्थिति नही कही जा सकती। नरेश मीणा जीत तो नही पाए। लेकिन बीजेपी की वाट जरूर लगा दी। राजस्थान का ये पहला उपचुनाव था, जिसमे मुख्यमंत्री भजनलाल ओर प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ को दो-दो बार अंता जाना पड़ा।
संगठन के कई नेता, मंत्री तक डेरा डाले रहे। लेकिन रिजल्ट क्या आया? कई जातिगत प्रभावशाली मंत्रियों, नेताओ को चुनाव की रणनीति बनाने वालों ने भीतर दाखिल नही होने दिया ! ये चुनाव रणनीतिकारों ने क्यों किया? किन कारणों से किया ये तो वे ही जाने लेकिन अपनी ही क़ब्र खोदने का काम किसने किया ये सोचने की बात है। राजे के लगातार कमान अपने हाथ मे लेने के बाद अब कहने लायक नही बचा कि आखिर ये हार का श्रेय किसके माथे मंडेगा। कांग्रेस के नेता पूरी तरह एकजुट थे सभी मनमुटाव के बावजूद अंता में कैंडिडेट को जिताने में जुटे थे और बीजेपी इस हालत में कहां थी। राजे की पसंद का उम्मीदवार था, इलाका भी उनका ही था तो धमाका भी उनका ही होता न! लेकिन ये आत्मघाती धमाका उनके लिए ही भारी पड़ेगा।
खुद के क्षेत्र में हारना इसे कैसे परिभाषित करेंगे? इसका खुलासा होना बाकी है। मुद्दे की बात है। ये हार सिर्फ अहंकार की है, व्यक्तिगत ईगो की है। सरकार पर दोष मण्डना इसलिए साबित नही होता कि सरकार और संगठन ने जैसा कहा वह किया फिर ये क्यों हुआ? निर्दलीय नरेश मीणा ने तीसरी बार हार का वरण कर हैट्रिक बना ली। अच्छा होता वे शालीन तरीके से चुनाव लड़ते लेकिन आक्रामक , गर्म मिजाज को एकतरफ रखकर लड़ते तो हो सकता है, परिणाम कुछ और होते लेकिन इतना तय है उनके पक्ष में जोशीले जवानों की फ़ौज थी। लेकिन उनके पास परिपक्व रणनीतिकार नही थे।
जबकि हाड़ौती में प्रमोद भाया ने अपनी रणनीति से फिर चुनाव जीता। उन्होंने राजे की रणनीति को भी हराया तो नए निर्दलीय नरेश को भी नही जमने दिया। भाया ने भी एक बार निर्दलीय चुनाव लड़ा था ओर जीता भी। भाया ने ये उपचुनाव जीतकर साबित कर दिया है कि वे झालावाड़- बारां लोकसभा क्षेत्र में काफी कुछ रद्दोबदल करने के काबिल है। ये अदृश्य खतरा अब राजे के लिए होगा!

उपचुनाव हालांकि सरकार के कामकाज की समीक्षा होती है। लेकिन सरकार और संगठन ने उम्मीदवार चुनने में राजे की पसंद को महत्व दिया, ऐसे में कांग्रेस जीत को लेकर सरकार के खिलाफ भले मुद्दा बनाएं। लेकिन सर्वविदित है कि अंता में हार के कई कारण है, जो राजनीति की फिजाओं में गूँजते रहेंगे।
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