मतदाताओं की उदासी में क्या रहस्य छिपा है!
@राजेन्द्र बागड़ी, वरिष्ठ पत्रकार
Political Report 20 अप्रेल ( दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) लोकसभा चुनाव के पहले चरण के अंतर्गत राजस्थान में 12 सीटों पर छुटपुट झड़पों को छोड़कर मतदान आम तौर पर शांति पूर्ण संपन्न हो गए। लेकिन मतदान प्रतिशत के कम रहने से क़ई सवाल खड़े हो गए। जिनका जवाब तो 4 जून को ही मिलेगा लेकिन हार- जीत को लेकर सब दलों के अपने- अपने कयास जरूर है। सबसे बड़ी चिंता ये है कि आखिर देश मे माहौल होने के बावजूद मतदाता मतदान से दूर क्यों रहा!
राजस्थान में विगत वर्ष 2019 में 63 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ था, उसके उलट 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में मतदान घटकर क्यों 57. 87 फीसदी रह गया। आंकड़ो में देखें तो अलवर में 55.79, भरतपुर में 52.69, करोली- धौलपुर में 49.29, दोसा में 55.21 , नागोर में 57.01, गंगानगर में 65.64, बीकानेर में 53 .96, चूरू में 62.98, झुंझुनूं में 52.29, सीकर में 57.28, जयपुर में 62.87 व जयपुर ग्रामीण में 62.87 फीसदी मतदान हुआ। ऐसे में कहीं 4 से लेकर 8 फीसदी तक मतदान कम हुआ है। ये बदलाव क्यो हुआ? किन वजहों से हुआ? ऐसे क़ई सवाल दिमाग मे तैर रहे है। राजस्थान में औसतन 6 फीसदी मतदान कम होने से किस दल को फायदा होगा और किसे नही, ये यक्ष पहेली बन गई है। इसका हालांकि जवाब 4 जून को मिलना है लेकिन कुछ संकेत है, जिनसे कम मतदान का रहस्य समझा जा सकता है।
जातिवाद पर क्या भारी रहा ?
राजस्थान में 25 सीटों पर अधिकतर दोनो दलों ने जातिवाद के आधार पर टिकट बाटे। जाट, गुर्जर, राजपूत, एसटी, एससी जातियों के ज्यादातर उम्मीदवार मैदान में उतरे। यहीं वजह रही कि ये आम चुनाव नही बनकर कुछ जातियों के लिए ही महत्वपूर्ण बने रहे। ओबीसी , ब्राह्मण, महाजन जातियों में मतदान के प्रति ज्यादा उत्साह नही देखा गया तो कहीं जातियों के परस्पर विरोधी उम्मीदवार खड़े होने से दोनो ही जातियों में भी इसी तरह की उदासीनता देखी गई। अप्रेल के मध्य में तापमान में भी बड़ी तेजी दर्ज गई। शादियों के सावे भी मतदान बढ़ाने में अवरोधक बन गए। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि क़ई कारण ऐसे रहे, जिससे मतदाताओ में साफ उदासीनता देखी गई।
क्या सरकार विरोधी “अंडर करंट ” था?
कम मतदान होने की वजह सब दल अपने नजरिये से देखेंगे और उसे अपने पक्ष में बताने का प्रयास करेंगे लेकिन इसी बिंदु के तथ्य को जरा गम्भीरता, गहनता से समझने की कोशिश करें तो देश, प्रदेश में कहीं भी पार्टी के उम्मीदवारों को लेकर जरूर विरोधाभास नजर आता रहा है लेकिन ” मोदी सरकार” के खिलाफ खुले तौर पर नाराजगी नजर नही आई। राम मंदिर में रामलला की प्राण- प्रतिष्ठा, कश्मीर से धारा 370 को हटाने को लेकर मतदाताओं में संतुष्टि के भाव जरूर नजर आए। रही बात बेरोजगारी, महंगाई की तो ये सवाल हर चुनावों का मुद्दा रहा है। ऐसे में राष्ट्रीय सुरक्षा, मोदी सरकार की नीतियों, कार्यप्रणाली, कोरोना में बेहतर प्रबंधन, निशुल्क वेक्सिनेशन जैसे अहम मुद्दे आज भी आमजन के जहन में है। यूक्रेन-रूस युद्ध, अफगानिस्तान से भारतीयों को सुरक्षित निकालने और देश प्रथम की नीति की वजह से मोदी सरकार को लेकर आम मतदाता में कोई रोष नजर नही आया। ऐसे में ये कहना मुश्किल है कि कम मतदान से राजस्थान की 12 सीटों पर नुकसान संभावित है। इन चुनावों में जितनी मेहनत बीजेपी और प्रधानमंत्री ने की है, उससे काफी कम कांग्रेस ने की है। कांग्रेस की सभाओं में कम भीड़ जुटना भी कोई संकेत तो है।
बीजेपी के कोर वोटर्स ने यदि वोट किया तो कांग्रेस के लिए खतरे की घण्टी?
राजस्थान की 12 सीटों पर 4 से 8 फीसदी मतदान कम हुआ है, ऐसे में यदि बीजेपी के कोर वोटर्स ने एकजुट होकर वोट किया है तो बीजेपी के लिए ज्यादा खतरा नही हो सकता। प्रधानमंत्री मोदी ने भी कम मतदान को लेकर बीजेपी की जीत की सम्भावना जताई है, उससे प्रतीत होता है कि राज्य में बीजेपी के वोटर्स ने घरों से निकलकर वोट किया है जबकि कांग्रेस इसमें पीछे रही है। ऐसे में समझा जा सकता है कि राजस्थान में 12 सीटों में ज्यादा खतरा नही है। राजस्थान में जहाँ जाट- राजपूत प्रतिद्वंद्वी है तो कहीं- कहीं गुर्जरों- मीणाओ में भी अनबन देखने को मिली है। ऐसे में भी इन बड़ी जातियों में मतदान के प्रति कम ही उत्साह देखा गया है। ये बात जरूर है कि यदि बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने मेहनत में कमी छोड़ी हो तो रिजल्ट उलट भी हो सकते है लेकिन हार- जीत का अंतर कम रहने वाला है विगत लोकसभा चुनाव से।



