कांग्रेस शुरू से बिखरी रही और जमानत नही बचा पाई!
@राजेन्द्र बागड़ी, वरिष्ठ पत्रकार
Political Report 25 नवम्बर ( दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) प्रदेश में हुए उपचुनावों के तहत बीजेपी की रणनीति कारगर सिद्ध हुई और देवली उनियारा में ऐतिहासिक जीत कायम की, जिसकी बीजेपी को दरकार थी। जबकि कांग्रेस की रणनीति उपचुनाव शुरू होते ही बिखरनी शुरू हुई, जो मतदान आते- आते तो खण्ड-खण्ड होकर चूर हो गई। हार-जीत को लेकर भले ही क़ई कारण गिनाए जाए। लेकिन बीजेपी जब मैदान में दम ठोक कर उतरी तो उनके पास खोने को कुछ नही था। केवल सलूम्बर की सीट के अलावा शेष सभी 6 सीट कांग्रेस, आरएलपी, आदिवासी पार्टी के कब्जे में थी।
देवली-उनियारा सीट तो वर्ष 2013 से कांग्रेस के पास थी और 2023 में भी कांग्रेस ने ही जीती थी। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में हरीश मीना टोंक- सवाईमाधोपुर सीट से चुनाव लड़े और सांसद बन गए। इसके बाद भी कांग्रेस इसे परम्परागत सीट ही मानती रही। जातिगत समीकरणों में भी कांग्रेस का पलड़ा भारी रहा लेकिन लोकसभा चुनाव के कुछ महीनों बाद खाली हुई देवली-उनियारा सीट पर भाजपा ने पुनः अपना कब्जा कर लिया। सवाल उठता है कि सांसद बनने के बाद कुछ अंतराल में ऐसा क्या हुआ, जो कांग्रेस न केवल चुनाव हारी बल्कि जमानत भी नही बचा पाए! ये सवाल आज के परिपेक्ष्य में विचारणीय है। जबकि बीजेपी ने उपचुनाव जीतने के लिए 4 महीने से अपनी तैयारी शुरू कर दी थी। सबसे पहले बीजेपी के प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़, प्रभारी राधामोहन गुप्ता, तत्कालीन सह प्रभारी विजया रहाटकर समेत कई नेताओ ने सीटो पर विश्लेषण कर लिया था।
सबसे पहले बीजेपी संगठन ने हार के कारणों को जाना और उस पर अपना ध्यान केंद्रित किया। भितरघात, बगावत, बागी व अनुशासन हीनता जैसे मामलों पर सभी पार्टी कार्यकर्ताओं को चेताया। उसके बाद पार्टी ने बैठकों में यहीं कहा कि पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए कमल का निशान ही उम्मीदवार है। इस वातावरण का प्रभाव ये पड़ा कि बीजेपी में पार्टी कार्यकर्ता एकजुट होते गए। पार्टी ने जैसे ही राजेन्द्र गुर्जर को उम्मीदवार घोषित किया पार्टी के दूसरे घड़े ने विरोध किया। कार्यकर्ताओ ने प्रदर्शन भी किया। लेकिन बीजेपी संगठन ने जल्द हालातों पर काबू पा लिया।
बीजेपी में जब इतना हो रहा था, तब कांग्रेस अपना उम्मीदवार ही तलाशने की कवायद में जुटी थी। संकेत तो मिल रहे थे कि पार्टी का टिकट उसी को मिलेगा, जिसे हरीश मीना का समर्थन प्राप्त होगा। इस कवायद में हरीश मीना के पुत्र हनुमंत मीना, पूर्व केंद्रीय मंत्री नमोनारायण मीना का नाम भी जोरों- शोरो से चला। लेकिन हरीश मीना अपने परिजनों को टिकट दिला पाने में विफल रहे। तब उन्होंने स्थानीय उम्मीदवार पर दांव खेला। करीब 2 दर्जन स्थानीय आशार्थियों में हरीश मीना ने किस्तुर चंद मीणा को टिकट दिला दिया। केसी मीणा को कांग्रेस का टिकट मिलने के साथ ही विरोध शुरू हुआ, जो आखरी वक्त तक मौजूद रहा। नरेश मीणा ने टिकट को लेकर जयपुर से उनियारा तक शक्ति प्रदर्शन किया और एक बार तो नरेश मीणा चुनाव नही लड़ने की बात कहकर वापस लौट गए। लेकिन कुछ घण्टों के बाद कांग्रेस में ” खेला” हो गया और नरेश मीणा ने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। यहीं से कांग्रेस की रणनीति में सेंध लगनी शुरू हो गई।
अपने टिकट में बाधा बने हरीश मीना को लेकर नरेश मीना ने हमले शुरू किए तो हरीश मीना की मनमानी के विरोध में कांग्रेस के क़ई नेताओं ने उनका साथ छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया। टिकट को लेकर जो असमंजस का वातावरण बना उससे कांग्रेस दिन दिन कमजोर होती गई। मीणा बहुल मतदाताओं ने भी केसी मीणा का साथ छोड़ दिया और वे निर्दलीय नरेश के पक्ष में खुलकर उतर गए। बीजेपी ने इस सब परिस्थितियों का पूरा फायदा उठाया। मुख्यमंत्री भजनलाल की चुनावी सभा से लेकर उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी, प्रेमचंद बैरवा , केबिनेट मंत्री कन्हैया लाल, हीरालाल नागर समेत कई विधायकों की फ़ौज उतार दी, जिन्होंने गांवों और पंचायतों स्तर तक माइक्रो मैनेजमेंट किया और बूथ जीतने की रणनीति तैयार की और मतदान दिवस तक इसे कारगर लागू किया।
जबकि कांग्रेस निर्दलीय नरेश मीना के प्रभाव से आजाद ही नही हो पाई। मीणा मतदाताओं के समक्ष केवल निर्दलीय नरेश मीणा का विकल्प ही शेष बचा। चुनाव प्रचार खत्म होते-होते ऐसा वातावरण बना कि हर कोई बीजेपी के राजेन्द्र गुर्जर की जीत पर आकर टिक गया। बहरहाल समूचे चुनावी परिदृश्य में बीजेपी रणनीति से लड़ी, माइक्रो मैनेजमेंट किया, भीतरघात पर लगाम लगाई और वह जीत कायम की, जिसकी किसी को कल्पना भी नही थी। इस ऐतिहासिक जीत ने सब रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। कांग्रेस को धूल चटा दी ओर शर्मनाक तो ये रहा कि कांग्रेस अपनी जमानत तक नही बचा पाई।



