Deoli News 12 अगस्त (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) मुनि सुप्रभ सागर एवं वैराग्य सागर महाराज के प्रवचन में धर्म, संस्कार और आत्म उन्नति का संदेश दिया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मंगलाचरण, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन, पद प्रक्षालन एवं जिनवाणी भेंट के साथ हुआ।
अंकित जैन डाबर ने बताया मुनि सुप्रभ सागर महाराज ने देव पूजा का महत्व बताते हुए मंगलाष्टक का अर्थ समझाया। उन्होंने कहा कि भगवान की सन्निधि से जीवन उन्नति और मुक्ति की ओर बढ़ता है। आत्मा को ऊपर उठाने के लिए पुरुषार्थ आवश्यक है और देव पूजा इसकी पहली सीढ़ी है। जिस प्रकार जल और अग्नि के संस्कार पाकर मिट्टी पूजनीय बन जाती है तथा शिल्पकार की कला से पत्थर की मूर्ति पूजनीय हो जाती है, उसी प्रकार जीवन में संस्कारों का होना जरूरी है। यहां महाराज ने गर्भ संस्कार पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आचार्यों ने गर्भधारण से लेकर मरण तक विभिन्न संस्कार बताए हैं और विवाह भी उनमें एक महत्वपूर्ण संस्कार है। महाभारत के अभिमन्यु प्रसंग के माध्यम से उन्होंने गर्भकाल में दिए जाने वाले संस्कारों का महत्व समझाया।

उन्होंने कहा कि संतान को अच्छे संस्कार देने की जिम्मेदारी माता-पिता की है और गर्भकाल में धार्मिक एवं शास्त्रीय ज्ञान का श्रवण-पठन भी महत्वपूर्ण है। वैराग्य सागर महाराज ने कहा कि सम्यकदृष्टि जीव अहंकार का त्याग करता है, क्योंकि अहंकार आत्मिक उन्नति में बाधक बनता है। उन्होंने अभिभावकों से बच्चों से अत्यधिक अपेक्षाएं नहीं रखने की बात कही और कहा कि बच्चे देखकर अधिक सीखते हैं। महात्मा गांधी के जीवन का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि बचपन में मिले धार्मिक और नैतिक संस्कारों ने उनके जीवन को प्रभावित किया।
प्रवचन के दौरान तीर्थंकर भगवान के गर्भ में आने से पूर्व होने वाली रत्नवृष्टि, इंद्र के आसन के कंपायमान होने, इंद्राणी द्वारा तीर्थंकर बालक के दर्शन तथा सुमेरु पर्वत पर 1008 क्षीरसागर के जल से कलशाभिषेक की धार्मिक महिमा का भी वर्णन किया गया। प्रवचनों में श्रद्धालुओं को संस्कार, धर्म और आत्मिक उन्नति के मार्ग पर चलने का संदेश दिया गया।


