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विलुप्त होती “बैल पूजन” की परंपरा का संरक्षण हमारी जिम्मेदारी: डॉ. प्रभुलाल सैनी

जूनिया में हुआ बैल पूजन का आयोजन


Deoli News 23 अक्टूबर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) दीपावली के बाद भारतीय संस्कृति और किसान परंपरा के अभिन्न अंग ‘बैल पूजन’ को संरक्षित करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए, पूर्व कृषि मंत्री एवं भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. प्रभुलाल सैनी ने कहा कि यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

दरअसल क्षेत्र के जूनिया गांव में बुधवार शाम बैल पूजन का आयोजन किया गया, जिसमें डॉ. सैनी ने शिरकत की। यहां किसानों ने डॉ. सैनी समेत अतिथियों का माल्यार्पण कर तिलक किया। उन्होंने कहा कि आधुनिकता के युग में किसानों के कामकाज में बैलों का महत्व कम होने और ट्रैक्टर जैसे आधुनिक उपकरणों के आने के कारण गांव-गांव में यह पारंपरिक पूजन विलुप्त होता जा रहा है।

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हालांकि, उन्होंने कहा कि भारतीय एवं किसान संस्कृति में बैलों के अमूल्य योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। इस अवसर पर जूनिया गांव में पाए गए बैल के एकमात्र जोड़े का पूरे विधि-विधान से पूजन किया गया। महिलाओं ने बैलों को सजाया, उनका श्रृंगार किया और उनकी पूजा कर परिवार की खुशहाली व समृद्धि की कामना की। डॉ. सैनी ने बताया कि जहां दीपावली पर गाय को लक्ष्मी स्वरूपा मानकर पूजा जाता है।

वहीं अगले दिनों में बैल पूजन किया जाता है। उन्होंने किसानों से आह्वान किया कि इस प्राचीन और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अंग को जीवित रखने के लिए कम से कम इसका आयोजन अवश्य किया जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि पूरे क्षेत्र में जूनिया गांव में ही बेल का एकमात्र जोड़ा पाया गया। इस आयोजन में भाजपा नेता उदयलाल गुर्जर, पूर्व सरपंच देवड़ावास बाबूलाल जांगिड़ समेत कई ग्रामीण और भाजपा कार्यकर्ता मौजूद थे।

“यह है बैल पूजन की परंपरा”

दरअसल बैल पूजन की परंपरा भारतीय संस्कृति का अंग है। दीपावली के अगले दिन गांवों में बेल पूजन किया जाता है। इससे पहले महिलाएं गोधन (गोबर) से आंगन पर मांडना लीपती (बनाती) थी। वहीं इस मांडने पर गाय के खूर बनाए जाते थे। जहां बैलों को खड़ा किया जाता था। पूजा में नए धान को रखा जाता था। पूजा के दौरान किसान एक ओर, जबकि दूसरी ओर महिलाएं मंगल गीत गाती थी।

किसान भी सामूहिक हिड़ गाते थे। पूजा के बाद महिलाएं बैलों को पूएं खिलाती थी। वही बाद में किसान और किसानी कार्य करने वाले पुरुषों को पानी पिलाया जाता था, यह परंपरा है। आज भी इसी परंपरा के अनुसार पूजन किया जाता है। वहीं इसी परंपरा के अनुसार जूनिया में पूजन हुआ।

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