पहली बार बनेगा अनुसूचित जाति वर्ग का चेयरमैन
(@ राजेन्द्र बागड़ी) वरिष्ठ पत्रकार
Desk News 13 अगस्त (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) समय चलता भी है और बदलता भी है कभी किसी की सवारी करता है तो कभी खुद व्यक्ति को अपनी पीठ पर बैठाकर लक्ष्य तक पहुँचाता भी है, समय की चाल और बदलती स्थिति किसी की मोहताज नही होती। देवली नगरपालिका के होने वाले चुनावों ने इस बात की ताईद भी कर दी है काफी अरसे के बाद पालिका का नेतृत्व अब अनुसूचित वर्ग के हाथ मे आने वाला है।
बीते तीन-चार दशकों के बाद ऐसा होना नए समय की सुगबुगाहट है। सामान्य वर्ग के बोलबाले वाले देवली शहर में एससी वर्ग के पालिकाध्यक्ष पद के लिए आरक्षित होने से शहर के सभी समीकरण बदल गए है। यद्दपि देवली नगरपालिका के नए परिसीमन के बाद ही राजनीतिक समीकरणों के बाद फेरबदल महसूस किया गया, लेकिन पालिकाध्यक्ष का पद आरक्षण में बदलने के बाद तो साफ प्रतीत हो रहा है कि अब शहर का नेतृत्व अब ऐतिहासिक रूप से बदलने वाला है। परिसीमन से पहले शहर में 25 सीटें थी और परिसीमन के बाद ये बढ़कर 35 हो गई । कहने का मतलब ये है कि 10 सीटे वे बढ़ी है जो पहले नगरपालिका का कभी हिस्सा नही रही। ये सभी सीटे शहर के समूचे भूगोल को इस बार न केवल बदलेगी बल्कि शहर के राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती भी देगी। बोरडा, अम्बापुरा, देवली गांव जैसे ग्रामीण क्षेत्र पहली बार पालिका क्षेत्र में जुड़े है, ये वे ग्रामीण इलाके है जो शहर से जुड़े होने के बाद भी राजनीतिक तौर पर उपेक्षित थे। देवली गांव, अम्बापुरा जैसे क्षेत्र अनुसूचित जाति बाहुल्य है।
शहर की नई 35 सीटों में से 10 नई सीटे सारे समीकरणों को बदलने के लिए काफी है। समीकरणों के हिसाब से किसी भी दल को अपना बहुमत प्राप्त करने के लिए 18 सीटे जीतने की दरकार होगी। ये संख्या काफी बड़ी है। पालिका के चुनावों का इतिहास देखे तो साफ तौर पर एक आध मौका छोड़ दे तो न कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिला और न बीजेपी को बहुमत मिला है। यानि तथ्य है कि शहर में कम सीटे रहने के बावजूद भी पालिकाध्यक्ष बनने के लिए निर्दलीयों से जोड़तोड़ करनी पड़ी है। नए परिसीमन के बाद तो ये गणित और जटिल हो गई है। सामान्य वर्ग को छोड़कर अब पालिकाध्यक्ष की सीट अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हुई है तो जाहिर है। अब बीजेपी हो या कांग्रेस दोनों ही दल इन जातियों के एक बड़े वर्ग को अपने पक्ष में लाने की कोशिश में जुटेंगे।
ग्रामीण इलाकों से परिसीमन में आई नई सीटे अपना अलग वर्चस्व दिखाने की कोशिश करेंगी। शहर के भूगोल में अब बड़ा परिवर्तन ये है कि पहले शहर की सीटें नेतृत्व तय करती थी, अब ग्रामीण भी अपनी हिस्सेदारी तय करेंगे। आने वाले चुनावों में यदि ये मुकाबला शहर व ग्रामीण भी हो जाए तो कोई अतिश्योक्ति नही होनी चाहिए। अब सारा दारोमदार वार्डो के आरक्षण पर टिका है, इनकी लॉटरी निकलते ही शतरंज़ के प्यादे जमने की कोशिश करेंगे।
इस बार पालिकाध्यक्ष ही नही वार्डो का चुनाव भी सबसे महंगा हो सकता है। अब दलीय स्थिति को देखें तो यहाँ पालिकाध्यक्ष बनने के लिए बड़े जोड़तोड़ होते रहे है अब आगे भी इसकी सम्भावनाये ज्यादा ही रहने वाली है। पहली बार 35 सीटों वाली नगरपालिका में निर्दलीय भी कुछ कमतर नही रहेंगे, निर्दलीय भी गणित बिगाड़ेंगे। नए परिसीमन से राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बढ़ी है। पालिका का भारी भरकम बजट भी उत्सुकता का कारण है।
पंच से पार्षद बनने की हसरतें ग्रामीण इलाकों में इस बार ज्यादा है। जाहिर है इन चुनावों में निर्दलीयों की बड़ी खेप मैदान में दमखम दिखाने उतरेगी। ये भी तय मानिए चुनाव परिणामों में अबकी बार निर्दलीयों की संख्या भी कम नही होगी। स्थानीय निकाय के चुनावों में दोनों ही दल टिकट के बलबूते पर दम ठोकेंगे पर टिकट नही मिलने पर बागी भी दलों के समीकरण प्रभावित करेंगे ये तय है। चूंकि स्थानीय निकाय चुनावों में दलबदल कानून लागू नही होता इसलिए दलीय अनुशासन की बात करना व्यर्थ है। जिसकी लाठी में दम होगा भैंस वही ले जाएगा, यह सूत्र हर चुनाव की भांति इस बार भी चरितार्थ होगा। सामान्य वर्ग, ओबीसी वर्ग के मतदाता और नेता आने वाले चुनावों में किंगमेकर की भूमिका अदा कर सकते है।
इस बार अनुसूचित वर्ग और अनुसूचित जनजाति वर्ग में एक गठजोड़ की सम्भावनाएं बलवती दिखाई दे रही है अगर ऐसा हुआ तो जातिगत समीकरण तेजी से बदल सकते है। शहर की राजनीति भले ही इस बार शांत दिखाई दे लेकिन चुनाव परिणामों के बाद पालिकाध्यक्ष के चुनाव की गणित बदल सकती है। ऐसी आशंका जरूर है।


