राजेन्द्र बागड़ी, (वरिष्ठ पत्रकार)
Desk News 14 अगस्त (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) राजनीति कई भेष बदलकर चलती भी है और चलाती भी है। स्थानीय चुनावों में कई दशकों से यही खेल चलता आया है और इस बार भी सम्भावनाये ऐसी ही लग रही है। पालिकाध्यक्ष की सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने से कइयों के सपनों पर पानी फिर गया है।
कईयों के “एजेंडे” अधूरे रह गए है तो कईयों के पद की हसरतें भी अधूरी रह गई है। देवली की राजनीति बड़ी शातिराना है, देखती कुछ और है और दिखाती कुछ और है। करीब 35 वर्ष के राजनीतिक खेल को कोई विरला ही समझ पाया है। इस चुनाव में भी प्रतीत होता है इस बार भी बड़े ” खेले” की तैयारी चालू हो गई है। अब देवली की राजनीति की शतरंज की बिसात फिर बिछने जा रही है। देवली के पालिकाध्यक्ष की सीट भले ही अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व हुई है। लेकिन सबसे खास तथ्य गौरतलब है कि पहली बार इस वर्ग के लिए आए पालिकाध्यक्ष पद के लिए शहर में कोई ऐसा बड़ा चेहरा नही है , जो इस पद पर स्वतंत्र तौर पर जीत सके या अपने बूते पर चेयरमैन बनकर काम कर सके। लिहाजा अब ” प्यादों” की खोज भी होगी और उन्हें अपने अनुकूल दांव पर लगाने की कोशिश भी होगी।
दोनों दलों की यहीं हालत है
नगरपालिका के 35 वार्डो में आरक्षण की लॉटरी निकलने के बाद बीजेपी और कांग्रेस समेत दोनों प्रमुख दलों की एक जैसी स्थिति है। शहर में अनुसूचित जाति का कोई बड़ा चेहरा सक्रिय राजनीति में नही है। बीजेपी के पास एक पूर्व पालिका को छोड़कर बड़ा नाम नही है तो कांग्रेस के पास तो फिलहाल इस कद का कोई नेता भी नही है। कांग्रेस को ऐसे चेहरों की तलाश रहेगी तो बीजेपी के सामने भी कई कारणों के चलते दूसरे उम्मीदवार की तलाश जारी रह सकती है। खैर समय सब भविष्य के गर्त से खोज निकालता है लेकिन अभी तो यहीं कह सकते है कि दोनों ही दलों को लॉटरी के हिसाब से वहाँ के स्थानीय उम्मीदवार को खोज निकालना बड़ी चुनौती होगी। गत कई दशकों से सक्रिय रहे शतरंज के बड़े खिलाड़ी चुप बैठ जाएंगे, ऐसा प्रतीत नही होता। वे फिर से संयोग ओर प्रयोग के प्रयास में है।
शतरंज की बिसात पर फिर से होंगे प्यादे अनुभवहीनता और आर्थिक प्रबंधन दोनों पक्ष ऐसे है, जिन पर कोई दल खरा नही उतर रहा। चुनाव में बड़ी मात्रा में धन खर्च होने की संभावना के चलते अनुसूचित जाति वर्ग के प्रत्याशी को अपने बूते पर चेयरमैन बनना दूर की कौड़ी लग रही है। असली समस्या ये है कि पार्षद की सीट पर जीतना और फिर अपने पक्ष में बहुमत लायक संख्या हासिल कर लेना सामान्य बात नही है। ऐसे में शतरंज के बड़े खिलाड़ी सक्रिय हो गए है। चाहते है भले ही वे पालिकाध्यक्ष न बने लेकिन उस पर उनका नियंत्रण जरूर होना चाहिए, जिससे वे अपने वर्चस्व को बनाये रख सके इसलिए एक बार लॉटरी निकल जाए सबसे बड़ा खेल अनुसूचित जाति की सीटों पर शुरू होने वाला है। यहीं वह खेल है जो उम्मीदवार का भविष्य तय करेगा। इस बार अनुसूचित जाति का उम्मीदवार स्वतंत्र तौर पर पार्षद जीत जाए और चेयरमैन बन जाए ऐसा होना कतई सम्भव नही लग रहा।
ऐसे अनुसूचित वार्डो में उम्मीदवारों की असली परीक्षा होने वाली है। शतरंज के खिलाड़ी तो अभी से अपने प्यादे ढूंढने लगे है। राजनीति सेवा का माध्यम है, इसे शहर के मतदाता भली भांति पहचान चुके है। इसलिए तय मानिए कि बड़े खिलाड़ियों के प्यादों की लड़ाई आने वाले समय मे खुलकर देखने को मिलेगी। चार दशकों के बाद अनुसूचित जाति वर्ग के हाथ मे शहर के नेतृत्व की बागडोर हाथ मे आने वाली है लेकिन इसे स्वतंत्र रहने देंगे तब न। खेल होगा, खिलाड़ी भी होंगे और पर्दे के पीछे से कठपुतली नचाने वाले भी होंगे..अच्छा होता अनुसूचित जाति वर्ग को खुलकर नेतृत्व करने का मौका दिया जाता तो शहर में नया नेतृत्व सामने आता। लेकिन ऐसा होगा नही। ऐसे हो सकता है आरक्षित सीटों का हिसाब- अब आइए शहर की 35 सीटों पर वर्ग के हिसाब से बंटवारा ऐसे सम्भव है। शहर की कुल 35 सीटों के हिसाब से एक अनुमान के मुताबिक अनुसूचित जाति की 7 से 8, अनुसूचित जनजाति की 2 से 3, ओबीसी वर्ग की 5 से 6 सीटे लॉटरी में आरक्षित हो सकती है।
जबकि 16 से 18 वार्ड सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित हो सकते है। देवली नगरपालिका में उपाध्यक्ष का पद सामान्य रहेगा लिहाजा असली खेला इसी पद के लिए संभव है। हालांकि वार्डो की आरक्षण लॉटरी 17 अगस्त को निकलेगी लेकिन एक मोटा अनुमान यहीं प्रस्तुत किया जा रहा है। ये अनुमान विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक है। सही स्थिति 17 अगस्त को दोपहर तक सामने आएगी। फिलहाल यहीं कहना उचित होगा कि इस महासमर में बड़े खिलाड़ी नए प्यादे उतारेंगे और उन्हें संरक्षण भी देंगे, ये बात दीगर है कि जनता जनार्दन का फैसला क्या होगा?



