Deoli News 17 अगस्त (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) मुनि सुप्रभ सागर महाराज ने छठ आवश्यक कार्य में पूजा के महत्व पर प्रवचन देते हुए कहा कि पूजा की शुरुआत सबसे पहले मंगलाष्टक से करनी चाहिए। इसके बाद जल शुद्धि के लिए मंत्रों द्वारा जलधारा छोड़ते हुए क्षीरसागर की स्थापना करनी चाहिए।
जिससे जल को और अधिक पवित्र किया जा सके। क्षीरसागर के जल में विकलत्रय जीव नहीं पाए जाते, लिहाजा उसे छानने की आवश्यकता नहीं होती। अभिषेक के लिए लाए गए जल का भी पूरी सावधानी से उपयोग करना चाहिए, अन्यथा कर्मों की निर्जरा नहीं हो पाती। मुनि वैराग्य सागर ने गुंसी में विज्ञाश्री माताजी के सानिध्य में 23 अगस्त को होने वाली जैनेश्वरी दीक्षा के लिए देवली आई दीक्षार्थी दीदियों से कहा कि राग-द्वेष का त्याग, स्वजन-परजन का त्याग और अंतर कषायों का त्याग करने से ही दीक्षा सार्थक होती है। उन्होंने कहा कि प्रतिकूलता में ही कर्मों की निर्जरा होती है, अनुकूलता में नहीं। जीवन में आने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों को साधना का अवसर मानकर स्वीकार करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आहार, सामायिक और प्रवचन से पहले मौन हो जाना चाहिए। आचार्यों ने कहा है कि धर्म प्रभावना के लिए स्वयं दीक्षा न ले सको तो दीक्षार्थियों की गोद भराई कर उनकी अनुमोदना करनी चाहिए। साथ ही भावना भानी चाहिए कि दीक्षार्थियों को अंत समय में समाधि मरण प्राप्त हो। प्रवचन के अंत में समाज के लोगों द्वारा दीक्षार्थी दीदियों की गोद भराई की गई तथा उनके पुण्य की अनुमोदना की गई।



