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HomeElection News"अहम और वहम" पालने वाले नेता को नामंजूर किया, "मतदाताओं" ने

“अहम और वहम” पालने वाले नेता को नामंजूर किया, “मतदाताओं” ने

@राजेन्द्र बागड़ी, वरिष्ठ पत्रकार


Political Report 24 नवम्बर (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) सांसद हरीश मीना की अपनी पसंद को जनता ने उपचुनाव में न केवल नकारा, बल्कि उनके पसंदीदा उम्मीदवार को मतदाताओं ने तीसरे स्थान पर ला पटका। यह चुनाव परिणाम दर्शाते हैं कि दो बार के विधायक व सांसद हरीश मीना की बात को मतदाताओं ने स्पष्ट तौर पर खारिज ही नही किया।

बल्कि उन्हें अस्पष्ट चेतावनी भी दे दी कि ” अहम और ” वहम” पालने वाले नेता को क्षेत्र की जनता ज्यादा मंजूर नही करती। जाहिर है हरीश मीना की राजनीतिक साख प्रभावित हुई है। अव्वल तो लगातार दो बार विधायक व सांसद के रूप में जीते हरीश मीना गत 11 वर्षों से आमजन से दूर ही रहे। उनका रवैया ” अफसरान” की तरह रहा। अपने कार्यकाल में वे मतदाताओं के यहां जन्म- मरण, ब्याह-शादी जैसे समारोहों से दूर रहे। वे कार्य से इलाके में आए तो उनके इर्दगिर्द अपने पसंदीदा नेताओ का घेरा ही बनाएं रखा। आम मतदाताओं से दूरी लोगो को बहुत खली। पार्टी के नेताओ के साथ भी उनका व्यवहार बेहतर नही रहा। तालमेल के अभाव में जो चुनावी प्रबंधन जमीन पर दिखना चाहिए, वह नजर नही आया। लगातार जीत से हरीश मीना अत्यधिक आत्मविश्वास में थे, उनको ये वहम था कि जैसे वे जीते है, वैसे ही वे कांग्रेस प्रत्याशी केसी मीणा को जीता लाएंगे। पर वैसे हुआ नही और नरेश मीणा ने भले ही चुनाव नही जीता।

लेकिन दूसरे नम्बर पर आकर ये साबित जरूर कर दिया कि उनके राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती जरूर देकर दर्शा दिया कि नरेश मीणा देवली- उनियारा से अगला विकल्प हो सकते है। अव्वल में नरेश मीणा ने चुनाव प्रचार में कांग्रेस को जितना नहीं कोसा उससे ज्यादा हरीश मीना को आड़े हाथों लिया। यहीं भाषण शैली मतदाताओं को भा गई। आक्रामक शैली के भाषणों से जल्द युवा मतदाताओ ने नरेश मीणा को अपना आइकॉन मान लिया और यहीं से हरीश मीणा की रणनीति बिखरनी शुरू हो गई। असल मे इस राजनीतिक विवाद की शुरुआत कांग्रेस के टिकट से हुई। नरेश मीणा पार्टी का टिकट चाहते थे और सांसद हरीश मीना अपने पसंदीदा उम्मीदवार चाहते थे। इसी बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री और हरीश मीना के बड़े भाई नमोनारायण मीणा का एक बहुचर्चित वीडियो वायरल हुआ, जो समूचे प्रकरण में बड़ा ” मोड़” ले आया। मीणा समाज मे ये संदेश बड़ी जोरों से फैला कि जो भाई का नही हुआ……!

दूसरी बात जो महत्वपूर्ण रही वह रही हरीश मीना के पसंदीदा उम्मीदवार केसी मीणा को टिकट दिलवाने की रही। केसी पर भी न जाने क्या-क्या आरोप लगे और सांसद मीना पर भी। असल मे भीतर ही भीतर सांसद के खिलाफ वातावरण बनना शुरू हुआ, जो नरेश मीणा के पक्ष में जाता दिखा। कांग्रेस प्रचार के आखरी 6 दिनों में बने इस नरेटिव का तोड़ ढूंढ ही नही पाई और कांग्रेस प्रत्याशी केसी मीणा तीसरे स्थान पर चले गए। ये कम आश्चर्यजनक नही है कि पहली बार किसी निर्दलीय उम्मीदवार ने बहुत कम समय मे प्रचार कर करीब 60 हजार मत प्राप्त कर लिए।

चुनाव परिणाम से स्पष्ट है कि सांसद के पसंदीदा उम्मीदवार को आम मतदाता ने नकार दिया। यहीं नही पूरे चुनाव में सांसद केवल आमसभाओं में नजर आएं और उसके बाद पूरे परिपेक्ष्य से नदारत दिखना भी कांग्रेस प्रत्याशी की हार का कारण बना। बिना सेनापति के युद्ध नही जीता जा सकता और यही हुआ। कांग्रेस की पूरी टीम बिखरी सी रही, न कोई गाइड करने वाला था और न रणनीति बनाने वाला दिखा। हालात ऐसे बने कि केसी मीना के साथ कोई प्रभावी नेता नजर तक नही आए। हरीश मीना वीटो लगाकर केसी मीना को टिकट तो दिला गए। लेकिन उन्हें जीता नही पाएं। जिससे उनकी राजनीतिक साख को गहरा आघात लगा है, जाहिर है उसकी वे पूर्ति ही नही कर पाएं। हालांकि नरेश मीणा जेल में है और हो सकता है कुछ महीनों तक जेल की हिरासत में रहे। लेकिन जब भी वे बाहर निकलेंगे तो उनके सामने यहीं देवली- उनियारा विधानसभा क्षेत्र उनकी नई कार्यस्थली बनना तय है, जहाँ से उन्हें करीब 60 हजार वोट मिले है। सांसद मीना क्षेत्र में भले ही सक्रिय रहे। लेकिन ये तय है कि जेल से जमानत पर बाहर आने के बाद नरेश मीना का ” इंकलाब” वाला नारा उनकी जमीन को ऊसर ही करेगा।

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