Deoli News 10 जून (दैनिक ब्यूरो नेटवर्क) देवली के अटल उद्यान में चल रहे 15 दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा ज्ञानयज्ञ महामहोत्सव में महामंडलेश्वर दिव्य मुरारी बापू ने धर्म के मर्म को समझाते हुए कहा कि माता-पिता और गुरु का सम्मान भारतीय संस्कृति की वह अनादिकाल से चली आ रही परंपरा है।
जो आज के समय में भी मनुष्य को सुखी और मर्यादित जीवन जीने की राह दिखाती है। बापू ने कहा कि एक सफल और आनंदमय जीवन की नींव माता-पिता की सेवा और गुरु के प्रति श्रद्धा भाव से ही रखी जा सकती है। कथा के दौरान बापू ने भगवान श्रीराम के जीवन के विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया कि श्रीराम ने सदैव गुरु और पिता के आदेशों का अक्षरसः पालन किया। उन्होंने विवाह संस्कार पर चर्चा करते हुए कहा कि श्रेष्ठता का मिलन ही आदर्श विवाह है, लिहाजा विवाह में वर और वधु के गुणों की समानता पर विशेष ध्यान दिया गया है। इस दौरान उन्होंने महर्षि विश्वामित्र के अयोध्या आगमन का प्रसंग सुनाया। बापू ने बताया कि किस प्रकार महाराज दशरथ ने विश्वामित्र का राजोचित सम्मान किया और जब ऋषि ने यज्ञ रक्षा के लिए श्रीराम और लक्ष्मण को मांगा, तो पिता के मन में वात्सल्य के कारण दुविधा हुई।
लेकिन जैसे ही कुल गुरु वशिष्ठ ने आज्ञा दी, महाराज दशरथ ने बिना किसी संकोच के अपने पुत्रों को गुरु के चरणों में समर्पित कर दिया। पिता की आज्ञा और गुरु के सानिध्य में श्रीराम-लक्ष्मण ने ताड़का वध, मारीच और सुबाहु जैसे राक्षसों का अंत कर यज्ञ को निर्विघ्न संपन्न कराया। श्रीराम कथा से जुड़े रामलाल सेन ने बताया कि कथा में जनकपुर प्रस्थान का वर्णन करते हुए उन्होंने अहिल्या उद्धार की महिमा बताई। बापू ने कहा कि जिस प्रभु की चरण रज मात्र से पत्थर बनी अहिल्या का उद्धार हो गया।
वही प्रभु हम सबके हृदय में विराजमान हैं। बापू ने श्रद्धालुओं का आह्वान किया कि वे अपने जीवन में भगवान के प्रति उसी अटूट श्रद्धा को धारण करें।


